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 केदारनाथ (Kedarnath) मंदिर

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केदारनाथ मंदिर हिंदू देवता भगवान शिव का सबसे पूजनीय मंदिर है।

भारतीय राज्य उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर हैं।

इस संपूर्ण क्षेत्र को केदारनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। यह स्थान छोटा चार धाम में से एक है। ।केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित हिन्दुओं का प्रसिद्ध मंदिर है।

उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धामऔर पंच केदार में से भी एक है।

यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डवों के पौत्र महाराजा जन्मेजय ने कराया था।

यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया।

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ धाम शिव के उपासकों के लिए सबसे प्रमुख स्थानों में से एक है।

हिमालय की निचली पर्वत श्रृंखला के विशाल बर्फ से ढके चोटियों, मनमोहक घास के मैदानों और जंगलों के बीच हवा भगवान शिव के नाम से गूंजती हुई प्रतीत होती है

इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम “केदार खंड” है और किंवदंती कहती है, महाभारत के पांडवों ने कौरवों को हराने के बाद, इतने सारे लोगों को मारने का दोषी महसूस किया और भगवान शिव से मोचन के लिए आशीर्वाद मांगा।

भगवान ने उन्हें बार-बार भगाया और बैल के रूप में केदारनाथ में शरण ली। भगवान ने केदारनाथ में सतह पर अपना कूबड़ छोड़ते हुए जमीन में डुबकी लगाई।

भगवान शिव के शेष भाग चार अन्य स्थानों पर प्रकट हुए और उनके स्वरूप के रूप में उनकी पूजा की जाती है। भगवान की भुजाएँ तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, पेट मदमहेश्वर में और उनके बाल कल्पेश्वर में प्रकट हुए।

केदारनाथ और चार उपर्युक्त तीर्थ श्रद्धेय पंच केदार तीर्थ यात्रा सर्किट बनाते हैं ।

हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र मंदिरों में से एक, केदारनाथ मंदिर, और बारहवां ज्योतिर्लिंग भारत में उत्तराखंड के केदारनाथ में मंदाकिनी नदी के पास गढ़वाल हिमालय पर्वतमाला के ऊपर 12000 फीट की ऊंचाई पर रुद्र हिमालय रेंज के सुरम्य परिवेश में स्थित है।

केदारनाथ के पास मंदाकिनी नदी का स्रोत है जो रुद्रप्रयाग में अलकनंदा से मिलती है।

केदारनाथ  भारत के उत्तराखण्ड राज्य के गढ़वाल मण्डल के रुद्रप्रयाग ज़िले में स्थित एक नगर है।

यह ज़िले के मुख्यालय, रुद्रप्रयाग से 86 किमी दूर है। यह केदारनाथ धाम के कारण प्रसिद्ध है, जो हिन्दू धर्म के अनुयाइयों के लिए पवित्र स्थान है।

यहाँ स्थित केदारनाथ मंदिर का शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंग में से एक है, और हिन्दू धर्म के चारधाम और पंच केदार में गिना जाता है

यहां स्थापित प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केदारनाथ मंदिर अति प्राचीन है। कहते हैं कि भारत की चार दिशाओं में चार धाम स्थापित करने के बाद जगतगुरु शंकराचार्य ने ३२ वर्ष की आयु में यहीं श्री केदारनाथ धाम में समाधि ली थी।

उन्हीं ने वर्तमान मंदिर बनवाया था। यहां एक झील है जिसमें बर्फ तैरती रहती है इस झील के बारे में प्रचलित है इसी झील से युधिष्ठिर स्वर्ग गये थे।

श्री केदारनाथ धाम से छह किलोमीटर की दूरी चौखम्बा पर्वत पर वासुकी ताल है यहां ब्रह्म कमल काफी होते हैं तथा इस ताल का पानी काफी ठंडा होता है।

यहां गौरी कुण्ड, सोन प्रयाग, त्रिजुगीनारायण, गुप्तकाशी, उखीमठ, अगस्तयमुनि, पंच केदार आदि दर्शनीय स्थल हैं।

चरम मौसम की स्थिति के कारण, शिव के ज्योतिर्लिंगम को स्थापित करने वाला केदारनाथ मंदिर केवल अप्रैल के अंत से नवंबर की शुरुआत के बीच खुला रहता है।

यहां शिव को केदारनाथ, ‘केदार खंड के भगवान’ के रूप में पूजा जाता है, जो इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम है।

परंपरा यह है कि केदारनाथ यात्रा करते समय, तीर्थयात्री पहले यमुनोत्री और गंगोत्री जाते हैं और अपने साथ यमुना और गंगा नदियों के स्रोतों से पवित्र जल लाते हैं और केदारेश्वर को चढ़ाते हैं।

पारंपरिक तीर्थ मार्ग हरिद्वार – ऋषिकेश – टिहरी (चंबा) – धरासु – यमुनोत्री – उत्तर काशी – गंगोत्री – फाटा – सोनप्रयाग- गौरीकुंड और केदारनाथ है।

ऊंचे हिमालय में स्थित, केदारनाथ मंदिर भारत में सबसे प्रसिद्ध शिवस्थलों में से एक है और इसे देश के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि केदारेश्वर की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर के महत्व को इस मान्यता से और समझा जा सकता है कि द्वापर में पांडवों ने यहां भगवान शिव की पूजा की थी।

यहां तक ​​कि आध्यात्मिक नेता आदि शंकराचार्य भी केदारनाथ से निकटता से जुड़े हुए हैं।

केदारनाथ भारत के उत्तराखंड राज्य में रुद्रप्रयाग जिले का एक शहर है और केदारनाथ मंदिर के कारण इसे महत्व मिला है । यह जिला मुख्यालय रुद्रप्रयाग से लगभग 86 किलोमीटर दूर है ।

यह रुद्रप्रयाग जिले में एक नगर पंचायत है। केदारनाथ चार छोटा चार धाम तीर्थ स्थलों में सबसे दूरस्थ है। यह हिमालय में समुद्र तल से लगभग 3,583 मीटर (11,755 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है, जो चोराबाड़ी ग्लेशियर के पास है, जो मंदाकिनी नदी का स्रोत है।

यह शहर बर्फ से ढकी चोटियों से घिरा है, जिनमें सबसे प्रमुख रूप से केदारनाथ पर्वत है। निकटतम सड़क प्रमुख लगभग 16 किमी दूर गौरीकुंड में है।

जून 2013 के दौरान उत्तराखंड राज्य में मूसलाधार बारिश के कारण अचानक आई बाढ़ से शहर को व्यापक विनाश का सामना करना पड़ा ।

केदारनाथ (Kedarnath) ६ महीने के लिए बंद रहता है कपाट

हर साल छह महीने के लिए केदारनाथ कपाट को बंद कर दिया जाता है क्योंकि ठंडे मौसम में यहां बर्फ गिरने लगा है और ठंड बढ़ जाती है।

इसके बाद अप्रैल-मई के महीने में अक्षय तृतीया को यहां का कपाट दर्शन के लिए खोला जाता है। इस बीच केदारनाथ बाबा को गुप्तकाशी के पास उखीमाठ में रखा जाता है।

इसके बाद तीन दिन की पैदल यात्रा के बाद बाबा केदार की उत्सव डोली केदारधाम पहुंचती है।केदारनाथ का मंदिर वर्ष के केवल छह महीने खुलता है जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है और वृश्चिक पूर्ण ग्रहण में होता है।

केदारनाथ (Kedarnath) मंदिर वास्तुशिल्प

यह मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है।

बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, कहा जाता है कि इस मन्दिर का जीर्णोद्धार आदि गुरु शंकराचार्य ने करवाया था।

मन्दिर को तीन भागों में बांटा जा सकता है १.गर्भ गृह , २.मध्यभाग  ३. सभा मण्डप ।

गर्भ गृह के मध्य में भगवान श्री केदारेश्वर जी का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग स्थित है जिसके अग्र भाग पर गणेश जी की आकृति और साथ ही माँ पार्वती का श्री यंत्र विद्यमान है ।

ज्योतिर्लिंग पर प्राकृतिक यगयोपवित और ज्योतिर्लिंग के पृष्ठ भाग पर प्राकृतिक स्फटिक माला को आसानी से देखा जा सकता है ।

श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग में नव लिंगाकार विग्रह विधमान है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को नव लिंग केदार भी कहा जाता है स्थानीय लोक गीतों से इसकी पुष्टि होती है ।

श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के चारों ओर विशालकाय चार स्तंभ विद्यमान है जिनको चारों वेदों का धोतक माना जाता है , जिन पर विशालकाय कमलनुमा मन्दिर की छत टिकी हुई है ।

ज्योतिर्लिंग के पश्चिमी ओर एक अखंड दीपक है जो कई हजारों सालों से निरंतर जलता रहता है जिसकी हेर देख और निरन्तर जलते रहने की जिम्मेदारी पूर्व काल से तीर्थ पुरोहितों की है ।

गर्भ गृह की दीवारों पर सुन्दर आकर्षक फूलों और कलाकृतियों को उकर कर सजाया गया है । गर्भ गृह में स्थित चारों विशालकाय खंभों के पीछे से स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान श्री केदारेश्वर जी की परिक्रमा की जाती है ।

पूर्व काल में श्री केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के चारो ओर सुन्दर कटवे पत्थरों से निर्मित जलेरी बनाई गई थी ।

मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है।

प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है।

इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं।

चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है।

इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था।

साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने करवाया था। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल १०वीं व १२वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है।

मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है।

केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं।

केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल हैं। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, २० किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और १४ किलोमीटर की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है।

मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं।

शिवलिंग स्वयंभू है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है।

मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है

केदारनाथ (Kedarnath)

केदारनाथ समुद्र तल से 11,746 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के उद्गगम स्‍थल के समीप है। यमुनोत्री से केदारनाथ के ज्‍योतिर्लिंग पर जलाभिषेक को हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है।

वायुपुराण के अनुसार भगवान विष्‍णु मानव जाति की भलाई के लिए पृथ्वि पर निवास करने आए। उन्‍होंने बद्रीनाथ में अपना पहला कदम रखा।

इस जगह पर पहले भगवान शिव का निवास था। लेकिन उन्‍होंने नारायण के लिए इस स्‍थान का त्‍याग कर दिया और केदारनाथ में निवास करने लगे।

इसलिए पंच केदार यात्रा में केदारनाथ को अहम स्‍थान प्राप्‍त है। साथ ही केदारनाथ त्‍याग की भावना को भी दर्शाता है।

यह वही जगह है जहां आदि शंकराचार्य ने 32 वर्ष की आयु में समाधि में लीन हुए थे। इससे पहले उन्‍होंने वीर शैव को केदारनाथ का रावल (मुख्‍य पुरोहित) नियुक्‍त किया था।

वर्तमान में केदारनाथ मंदिर 337वें नंबर के रावल द्वारा उखीमठ, जहां जाड़ों में भगवान शिव को ले जाया जाता है, से संचालित हो रहा है।

इसके अलावा गुप्‍तकाशी के आसपास निवास करनेवाले पंडित भी इस मंदिर के काम-काज को देखते हैं।

प्रशासन के दृष्टिकोण इस स्‍थान को इन पंडितों के मध्‍य विभिन्‍न भागों में बांट दिया गया है। ताकि किसी प्रकार की परेशानी पैदा न हो।

केदारनाथ मंदिर न केवल आध्‍यात्‍म के दृष्टिकोण से वरन स्‍थापत्‍य कला में भी अन्‍य मंदिरों से भिन्‍न है। यह मंदिर कात्‍युरी शैली में बना हुआ है।

यह पहाड़ी के चोटि पर स्थित है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्‍थरों का प्रयोग बहुतायत में किया गया है। इसका छत लकड़ी का बना हुआ है जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है।

मंदिर के बाह्य द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी का विशालकाय मूर्ति बना हुआ है। चारधाम यात्रा में तीसरा प्रमुख धाम केदारनाथ धाम है। केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों की सूची में, है और पंच-केदार में सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है।

यह धाम हिमालय की गोद में और मंदाकिनी नदी के तट के पास स्थित है जो 8 वीं ईस्वी में आदि-शंकराचार्य द्वारा निर्मित है।

किंवदंतियों के अनुसार, कुरुक्षेत्र की महान लड़ाई के बाद पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे, और इन पापो से मुक्त होने के लिये उन्होंने शिव की खोज शुरू की ।

परन्तु भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे।

उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे । पांडवों से छिपने के लिए, शिव ने खुद को एक बैल में बदल दिया और जमीन पर अंतर्ध्यान हो गए।

लेकिन भीम ने पहचान लिया कि बैल कोई और नहीं बल्कि शिव है और उन्होंने तुरंत बैल के पीठ का भाग पकड़ लिया। पकडे जाने के डर से बैल जमीन में अंतर्ध्यान हो जाता है और पांच अलग-अलग स्थानों पर फिर से दिखाई देता है- ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ ( जो आज पशुपतिनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है), शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए।

इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।

दीपावली के बाद, सर्दियों में मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते है और शिव की मूर्ति को उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में ले जाया जाता है जो अगले छह महीनों तक उखीमठ में रहती है।

ऊंचाई – 11,755 ft. सर्वश्रेष्ठ समय – मई-जून और सितंबर-नवंबर दर्शन समय – दोपहर 3:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक बंद रहता है और बाकी घंटों के लिए खुला रहता है।

घूमने के स्थान – भैरव नाथ मंदिर, वासुकी ताल (8 किमी ट्रेक), त्रिजुगी नारायण, आदि कैसे पहुंचे – गौरीकुंड अंतिम पड़ाव है जहाँ कोई भी परिवहन वाहन जा सकता है।

और गौरीकुंड से केदारनाथ पहुंचने के लिए आपको 16 किमी की ट्रेकिंग करनी होगी। अगर आप ट्रेकिंग से बचना चाहते हैं तो आप एक विकल्प यह है कि आप गुप्तकाशी / फाटा / गौरीकुंड आदि से हेलीकॉप्टर की उड़ान ले सकते हैं।(हेलीकाप्टर द्वारा चारधाम यात्रा) यात्रा मार्ग – रुद्रप्रयाग – गुप्तकाशी – फाटा- रामपुर – सीतापुर – सोनप्रयाग – गौरीकुंड – केदारनाथ (16 किमी)

केदारनाथ बाबा के दर्शन से स्वर्ग की प्राप्ति

केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए लोगों को खतरनाक इलाकों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि यह चार धामों में एक सबसे पवित्र धामों में माना जाता है।

शिव पुराण में कहा गया है कि केदारनाथ में जो तीर्थयात्री जाते है उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है और अपने सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।

केदारनाथ के पानी को अत्यंत धार्मिक महत्व दिया जाता है। लोगों का कहना है कि यदि आप मंदिर में अपनी प्रार्थना के बाद पानी पीते हैं, तो आप अपने सभी पापों से मुक्ती मिल जाएगी।

काफी ऊंचाई पर हैं केदारनाथ बाबा

केदारनाथ पहुंचना सबसे ज्यादा कठिन माना जाता है, क्योंकि यह 11,755 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

वहीं, किसी अन्य स्थान से केदारनाथ के लिए कोई सीधा सड़क संपर्क नहीं है। यहां पहुंचने के सिर्फ दो तरीके हैं।

पहला पैदल चलकर जाएं जिसके लिए 14 किमी का लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा या दूसरा खच्चरों और घोड़ों का इस्तेमाल करें। हालांकि तीसरा विकल्प हेलिकॉप्टर भी है जिसकी सेवा ली जा सकती है जो देहरादून से मिलता है।

कैसे पड़ा केदारनाथ का नाम

केदारनाथ नाम कहा से आया इसे लेकर के कई लोगों के अलग-अलग कहानी है, लेकिन जो सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वो है कि सतयुग में शासन करने वाले राजा केदार के नाम पर इस स्थान का नाम केदार पड़ा।

मंदिर की बनावट

यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोर प्लेटफार्म पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है।

बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की।

मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगोंमें से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है।

तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है।

उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं।

केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

शब्द-साधन

“केदारनाथ” नाम का अर्थ “क्षेत्र के भगवान” है। यह संस्कृत के शब्द केदार (“क्षेत्र”) और नाथ (“भगवान”) से लिया गया है।

काशी केदार महात्म्य पाठ में कहा गया है कि इसे तथाकथित इसलिए कहा जाता है क्योंकि ” मुक्ति की फसल ” यहाँ उगती है। केदार नाम का अर्थ शक्तिशाली भगवान शिव का एक और नाम रक्षक और संहारक है।

मंदिर के चारों ओर का सुंदर वातावरण ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग में काफी शांति है, ध्यान करने के लिए एक सुंदर जगह है।

यहां का मुख्य आकर्षण शिव मंदिर है, जो एक लोकप्रिय हिंदू मंदिर और तीर्थ है, जो दुनिया भर से भक्तों को आकर्षित करता है।

शिव को सभी जुनूनों का अवतार माना जाता है प्रेम, घृणा, भय, मृत्यु और रहस्यवाद जो उनके विभिन्न रूपों के माध्यम से व्यक्त किए जाते हैं।

क्षेत्र में ही भगवान शिव को समर्पित 200 से अधिक मंदिर हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण केदारनाथ है।

केदारनाथ मंदिर की विशेषता

केदारनाथ मंदिर 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौडा है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है और आश्चर्य की बात यह है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी।

पत्थरों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तरीके का इस्तेमाल किया गया है। इस मज़बूती के कारण ही मंदिर आज भी अपने उसी स्वरूप में खड़ा है।

यह मंदिर तीनों तरफ से पहाडों से घिरा हुआ है और यहाँ पाँच नदियों का संगम भी होता है। उनके नाम मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी आदि है।

इन नदियों में से कुछ का अस्तित्व अब नहीं रहा, लेकिन अलकनंदा और मंदाकिनी आज भी मौजूद है।

रुचि के स्थान

केदारनाथ मंदिर के अलावा, शहर के पूर्वी हिस्से में भैरवनाथ मंदिर है, और माना जाता है कि इस मंदिर के देवता, भैरवनाथ , सर्दियों के महीनों के दौरान शहर की रक्षा करते हैं।

शहर से लगभग 6 किमी ऊपर की ओर, चोराबारी ताल, एक झील सह ग्लेशियर है जिसे गांधी सरोवर भी कहा जाता है।  केदारनाथ के पास, भैरव झाम्प नामक एक चट्टान है। 

अन्य दर्शनीय स्थलों में केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य , आदि शंकराचार्य समाधि और रुद्र ध्यान गुफा शामिल हैं।

जलवायु

केदारनाथ मंदिर सर्दियों के महीनों में भारी बर्फबारी के कारण बंद रहता है। छह महीने के लिए, नवंबर से अप्रैल तक, केदारनाथ और मध्यमहेश्वर मंदिर के उत्सव मूर्ति (मूर्ति) के साथ पालकी को गुप्तकाशी के पास ऊखीमठ में ओंकारेश्वर मंदिर में लाया जाता है ।

पुजारी और अन्य गर्मी के समय के निवासी भी सर्दी से निपटने के लिए आसपास के गांवों में चले जाते हैं। 55 गांवों और आसपास के अन्य गांवों के तीर्थ पुरोहित के लगभग 360 परिवार आजीविका के लिए कस्बे पर निर्भर हैं।

कोपेन -गीजर जलवायु वर्गीकरण प्रणाली के अनुसार, केदारनाथ की जलवायु मानसून-प्रभावित उपनगरीय जलवायु  है, जो हल्के, बरसाती ग्रीष्मकाल और ठंडे, बर्फीले सर्दियों के साथ एक समान वर्षा उप -आर्कटिक जलवायु  की सीमा बनाती है।

निरंतर बदलती रहती है यहां की प्रकृति :

केदारनाथ धाम में एक तरफ करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदार, दूसरी तरफ 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड का पहाड़।

न सिर्फ 3 पहाड़ बल्कि 5 नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है।

इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है। यहां कब बादल फट जाए और कब बाढ़ आ जाए कोई नहीं जानता।

मंदिर का इतिहास

केदारनाथ प्राचीन काल से एक तीर्थस्थल रहा है। मंदिर के निर्माण का श्रेय महाभारत में वर्णित पांडव भाइयों को दिया जाता है । 

हालांकि, महाभारत में केदारनाथ नामक किसी स्थान का उल्लेख नहीं है। केदारनाथ के शुरुआती संदर्भों में से एक स्कंद पुराण (सी। 7 वीं -8 वीं शताब्दी) में मिलता है, जिसमें केदार (केदारनाथ) का नाम उस स्थान के रूप में रखा गया है जहां भगवान शिव ने अपने उलझे हुए बालों से गंगा के पवित्र जल को छोड़ा था जिसके परिणामस्वरूप इसका निर्माण हुआ था।

केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही महत्व है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।

केदारनाथ (Kedarnath) मंदिर
केदारनाथ (Kedarnath) मंदिर

इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थ रहा है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाया हुआ है जो १०७६-९९ काल के थे।

एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है।

केदारनाथ जी के तीर्थ पुरोहित इस क्षेत्र के प्राचीन ब्राह्मण हैं, उनके पूर्वज ऋषि-मुनि भगवान नर-नारायण के समय से इस स्वयंभू ज्योतिर्लिंग की पूजा करते आ रहे हैं, जिनकी संख्या उस समय ३६० थी।

पांडवों के पोते राजा जनमेजय ने उन्हें इस मंदिर में पूजा करने का अधिकार दिया था, और वे तब से तीर्थयात्रियों की पूजा कराते आ रहे हैं।

आदि गुरु शंकराचार्य जी के समय से यहां पर दक्षिण भारत से जंगम समुदाय के रावल व पुजारी मंदिर में शिव लिंग की पूजा करते हैं, जबकि यात्रियों की ओर से पूजा इन तीर्थ पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा की जाती है मंदिर के सामने पुरोहितों की अपने यजमानों एवं अन्य यात्रियों के लिये पक्की धर्मशालाएं हैं, जबकि मंदिर के पुजारी एवं अन्य कर्मचारियों के भवन मंदिर के दक्षिण की ओर हैं ।

किंवदंती है कि, “नर और नारायण ने पृथ्वी से बने शिवलिंग के सामने घोर तपस्या की थी”।

केदारनाथ भगवान शिव भक्तों के लिए एक प्रसिद्ध मंदिर है और केदारनाथ मंदिर का इतिहास लगभग 1000 वर्ष से भी अधिक पुराना है।

किंवदंती कहती है कि उन्होंने शिव से ज्योतिर्लिंगम के रूप में एक स्थायी निवास स्थान लेने का अनुरोध किया। केदारेश्वर एक ऐसा स्थान है जहां पांडवों ने शिव का आशीर्वाद मांगा था।

एक अन्य किंवदंती के अनुसार, देवी पार्वती ने अर्धनारीश्वर के रूप में शिव के साथ एकजुट होने के लिए केदेश्वर की पूजा की। भैरों एक मंदिर है जो भैरोनाथजी को समर्पित है जिनकी केदारनाथ मंदिर के उद्घाटन और समापन पर औपचारिक रूप से पूजा की जाती है।

मान्यता है कि मंदिर के बंद होने के समय भैरवनाथजी इस भूमि की बुराई से रक्षा करते हैं। केदारनाथ 12 ज्योतिर्लिंगों या ब्रह्मांडीय प्रकाश में से एक है।

मंदिर एक हजार साल से अधिक पुराना है और रुद्र हिमालय, उत्तरी भारत में स्थित है। यह दुनिया के सबसे ऊंचे ज्योतिर्लिंग केदारनाथ लिंगम का घर है।

केदारनाथ (Kedarnath) शिवलिंग उत्पत्ति का रहस्य

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार शृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे।

उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे।

इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे।

भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले।

वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले।

पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया।

अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा।

तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए।

उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ।

अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है।

शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है।

यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

केदारनाथ और पशुपति नाथ मिलकर पूर्ण शिवलिंग बनता है : केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। इसे अर्द्धज्योतिर्लिंग कहते हैं।

नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को मिलाकर यह पूर्ण होता है। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग अतिप्राचीन है। यहां के मंदिर का निर्माण जन्मेजय ने कराया था और जीर्णोद्धार आदिशंकराचार्य ने किया था।

एक रेखा पर बने हैं केदारनाथ और रामेश्‍वरम मंदिर केदारनाथ मंदिर को रामेश्वरम मंदिरकी सीध में बना हुआ माना जाता है। उक्त दोनों मंदिरों के बीच में कालेश्वर (तेलंगाना), श्रीकालाहस्ती मंदिर (आंध्रा), एकम्बरेश्वर मंदिर (तमिलनाडु), अरुणाचल मंदिर (तमिलनाडु), तिलई नटराज मंदिर (चिदंबरम्) और रामेश्वरम् (तमिलनाडु) आता है। ये शिवलिंग पंचभूतों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

केदार घाटी में दो पहाड़ हैं-

नर और नारायण पर्वत। विष्णु के 24 अवतारों में से एक नर और नारायण ऋषि की यह तपोभूमि है। दूसरी ओर बद्रीनाथ धाम है जहां भगवान विष्णु विश्राम करते हैं।

कहते हैं कि सतयुग में बद्रीनाथ धाम की स्थापना नारायण ने की थी। इसी आशय को शिवपुराण के कोटि रुद्र संहिता में भी व्यक्त किया गया है।

दर्शन का समय

केदारनाथ जी का मन्दिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रात: 6:00 बजे खुलता है।

दोपहर तीन से पाँच बजे तक विशेष पूजा होती है और उसके बाद विश्राम के लिए मन्दिर बन्द कर दिया जाता है।

केदारनाथ जी का मन्दिर
केदारनाथ जी का मन्दिर

पुन: शाम 5 बजे जनता के दर्शन हेतु मन्दिर खोला जाता है।

पाँच मुख वाली भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके 7:30 बजे से 8:30 बजे तक नियमित आरती होती है।

रात्रि 8:30 बजे केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मन्दिर बन्द कर दिया जाता है।

शीतकाल में केदारघाटी बर्फ़ से ढँक जाती है। यद्यपि केदारनाथ-मन्दिर के खोलने और बन्द करने का मुहूर्त निकाला जाता है, किन्तु यह सामान्यत: नवम्बर माह की 15 तारीख से पूर्व (वृश्चिक संक्रान्ति से दो दिन पूर्व) बन्द हो जाता है और छ: माह *बाद अर्थात वैशाखी (13-14 अप्रैल) के बाद कपाट खुलता है।

ऐसी स्थिति में केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को ‘उखीमठ’ में लाया जाता हैं। इसी प्रतिमा की पूजा यहाँ भी रावल जी करते हैं।

केदारनाथ में जनता शुल्क जमा कराकर रसीद प्राप्त करती है और उसके अनुसार ही वह मन्दिर की पूजा-आरती कराती है अथवा भोग-प्रसाद ग्रहण करती है।

पूजा का क्रम

भगवान की पूजाओं के क्रम में प्रात:कालिक पूजा, महाभिषेक पूजा, अभिषेक, लघु रुद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अष्टोपचार पूजन, सम्पूर्ण आरती, पाण्डव पूजा, गणेश पूजा, श्री भैरव पूजा, पार्वती जी की पूजा, शिव सहस्त्रनाम आदि प्रमुख हैं।

शाम के वक्त सहस्रनामम पथ, महिमस्तोत्र पथ, ताण्डवस्तोत्र पथ पूजा की जाती है।मन्दिर-समिति द्वारा केदारनाथ मन्दिर में पूजा कराने हेतु जनता से जो दक्षिणा (शुल्क) लिया जाता है, उसमें समिति समय-समय पर परिर्वतन भी करती है।

मान्यताएं

6 माह तक नहीं बुझता है दीपक

दीपावली महापर्व के दूसरे दिन के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है।

पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं, तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है।

6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है। लेकिन आश्चर्य की बा‍त कि 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है। कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी की वैसी ही साफ-सफाई मिलती है, जैसी कि छोड़कर गए थे।

तूफान और बाढ़ में भी रहता है सुरक्षित

 16 जून 2013 की रात प्रकृति ने कहर बरपाया था। जलप्रलय से कई बड़ी-बड़ी और मजबूत इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहकर पानी में बह गईं, लेकिन केदारनाथ के मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा।

आश्चर्य तो तब हुआ, जब पीछे पहाड़ी से पानी के बहाव में लुढ़कती हुई विशालकाय चट्टान आई और अचानक वह मंदिर के पीछे ही रुक गई!

उस चट्टान के रुकने से बाढ़ का जल 2 भागों में विभक्त हो गया और मंदिर कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया। इस प्रलय में लगभग 10 हजार लोगों की मौत हो गई थी।

केदारनाथ (Kedarnath) मंदिर की संरचना

कैसे बना होगा यह मंदिर अभी भी रहस्य बरकरार  यह मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और मजबूत शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है।

6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़े 85 फुट ऊंचे, 187 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर व तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी? खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई? पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

लुप्त हो जाएगा केदारनाथ

पुराणों की भविष्यवाणी के अनुसार इस समूचे क्षेत्र के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा और भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे।

पुराणों के अनुसार वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री’ नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।

केदारनाथ के पास पर्यटन स्थल

केदारनाथ अपने आप में एक पर्यटन स्थल है किलेकिन केदारनाथ धाम के पास, कई अन्य तीर्थ और पर्यटक आकर्षण हैं, जिनमें उच्च ऊंचाई वाली झीलें और ट्रेकिंग भ्रमण शामिल हैं।

केदारनाथ यात्रा के दौरान त्रियुगीनारायण, गुप्तकाशी, चोपता, देवरिया ताल, पंच केदार, चंद्रशिला, कालीमठ और अगस्त्यमुनि जैसे स्थानों की भी यात्रा की जा सकती है।

त्रियुगीनारायण वह प्रसिद्ध स्थान है जहाँ भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था, और यह इस क्षेत्र के खिंचाव का अनुभव करने के लिए देखने लायक है। चोपता और देवरिया तलारे को गढ़वाल क्षेत्र की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक माना जाता है। यह हिमालय की पहाड़ियों का शानदार नजारा पेश करता है और आपको स्वर्ग का अहसास कराता है।

केदारनाथ, मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर जैसे मंदिर गढ़वाल हिमालय में भगवान शिव के पांच सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों के दर्शन करने चाहिए।

स्थानीय लोग इन्हें पंच केदार के नाम से जानते हैं। उत्तराखंड में पंच केदार का बहुत महत्व है। पवित्र अनुभव के अलावा, यदि किसी की वास्तुकला में गहरी रुचि है, तो उन्हें अगस्तेश्वर महादेव मंदिर जाना चाहिए जो ऋषि अगस्त्य को समर्पित है और पुरातात्विक महत्व का भी है, देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं पत्थरों पर उकेरा गया है। इसके अलावा, अधिक अद्भुत और सांस लेने वाले दृश्यों के लिए केदार मासिफ पर जाएं। यह तीन प्रमुख पहाड़ों केदार गुंबद, भारतेकुंठ और केदारनाथ द्वारा निर्मित एक उत्कृष्ट पुंजक है। कालीमठ।

धर्म

केदारनाथ हिंदू चार धाम यात्रा (तीर्थयात्रा) मंदिर स्थलों में से एक है। पृथ्वी पर शिव-लोक (पृथ्वी) कहा जाता है, इस ज्योतिर्लिंग को पूरे भारत में 12 श्रद्धेय ज्योतिर्लिंगम स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

चरम मौसम की स्थिति के कारण, केदारनाथ मंदिर छह महीने का शीतकालीन अवकाश लेता है जो दिवाली के समय भाई दूज के त्योहार से शुरू होता है और अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में अक्षय तृतीया त्योहार के बाद भक्तों के लिए फिर से खोल दिया जाता है।

उस समय के दौरान, मूर्ति को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में ऊखीमठ ले जाया जाता है और पुजारी केदारनाथ लौटने तक अगले 6 महीनों तक वहां पूजा करते हैं।

केदारनाथ मंदिर के बारे में अनोखे तथ्य हैं:

मंदिर संरक्षित और अविनाशी है।

2013 में विनाशकारी बादल फटने से उत्तराखंड में भीषण आपदा आई थी। जबकि राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में विनाशकारी भूस्खलन और बाढ़ का सामना करना पड़ा, पहाड़ के नीचे एक विशाल शिलाखंड आने के बावजूद मंदिर को बचा लिया गया।

अजीब तरह से, जैसे ही यह पहाड़ से नीचे आया, विशाल ढीला, लुढ़कता हुआ शिलाखंड मंदिर से कुछ ही मीटर की दूरी पर रुक गया और वास्तव में उस आपदा में भी किसी भी विनाश से बचा लिया। फुटेज से पता चलता है कि मंदिर के पीछे एक बड़ी चट्टान ने मंदिर की ओर आने वाले पानी की भारी बाढ़ को मोड़ दिया।

 पांडव और आदि शंकराचार्य

सनातन धर्म (हिंदू धर्म) के सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक केदारनाथ मंदिर मंदिर उच्च ऊंचाई पर स्थित है, जिसका निर्माण महाभारत के पांडवों द्वारा किया गया था, जो युद्ध में मारे गए असंख्य निर्दोष व्यक्तियों के लिए  क्षमा मांग रहे थे। 

कुरुक्षेत्र के महान युद्ध के बाद पांडवों ने भगवान शिव की तलाश में काशी की यात्रा की और भोले शंकर भगवान हैं, खुद को एक बैल के रूप में बदलकर उत्तराखंड भाग गए। पांडवों ने यह सुना और काशी से उत्तराखंड की यात्रा की।

जल्द ही उन्होंने भगवान शिव को उनके बैल रूप में पाया और प्रार्थना करने लगे। वे कहते हैं कि गुप्तकाशी वह स्थान है जहां पांडवों ने शिव को बैल के रूप में पाया – जिन्होंने जल्द ही उन्हें आशीर्वाद दिया।

बाबा भैरों नाथ

बाबा भैरवनाथ केदारनाथ मंदिर की रक्षा करते हैं

ऐसा माना जाता है कि भगवान भैरों नाथ जी, जिनका मंदिर इस हिमालय क्षेत्र में निकटता में स्थित है, केदारनाथ मंदिर की रखवाली करते हैं। भैरों नाथ को “क्षेत्रपाल” के रूप में भी जाना जाता है, जो भगवान शिव के उग्र अवतार हैं जो तबाही और विनाश से जुड़े हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह भैरों नाथ जी हैं जो बुरी आत्माओं को दूर भगाते हैं और मंदिर को किसी भी तरह के नुकसान से मुक्त रखते हैं।

भैरों बाबा मंदिर, यह केदारनाथ मंदिर के दक्षिण में स्थित है और जो लोग केदारनाथ मंदिर जाते हैं उन्हें भी भैरों बाबा का मंदिर जाना पड़ता है।

 कर्नाटक के पुजारी यहां कन्नड़ में पूजा करते हैं

केदारनाथ मंदिर के हिंदू मंदिर की उत्तर-दक्षिण एकता के एक दिलचस्प उदाहरण में, कर्नाटक के वीरा शैव संगम समुदाय से संबंधित रावल समुदाय के सदस्यों द्वारा अनुष्ठान किया जाता है।

10वीं शताब्दी ईस्वी से, यहां पूजा कन्नड़ भाषा में और उसी पैटर्न और क्रम में की गई है। रावल, या प्रधान पुजारी, मंदिर के अंदर अनुष्ठान नहीं करते हैं, बल्कि इस जिम्मेदारी को अपने सहायकों को सौंपते हैं।

जब सर्दियों के मौसम में देवता को ऊखीमठ ले जाया जाता है, तो रावल मुख्य देवता के साथ अपना आधार बदल लेते हैं। मंदिर के पुजारियों के पैनल में पांच प्रधान पुजारी हैं, और उनमें से प्रत्येक को बारी-बारी से प्रधान पुजारी की उपाधि दी जाती है।

“16 जून, 2013 को केदारनाथ मंदिर के ऊपर पहाड़ों पर बैठी चोराबाड़ी झील के फटने के साथ एक विशाल बादल फट गया, जिससे पानी की एक अकल्पनीय मात्रा नीचे आ गई, जिसने अंततः असंख्य गांवों को नष्ट कर दिया और हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

सभी  विनाश के बावजूद वह मंदिर अपनी जमीन पर खड़ा था। यह एक विशाल शिलाखंड के कारण था जो नीचे लुढ़क गया और इसे मंदिर के ठीक पीछे खड़ा कर दिया और इसकी रक्षा की .. तीर्थयात्रियों की सभी प्रार्थनाओं और विश्वास और शिव की शक्ति ने इसे संभव बनाया

जनसांख्यिकी

2001 तकभारत की जनगणना के अनुसार, केदारनाथ की जनसंख्या 2021 तक 612 है। पुरुष जनसंख्या का 99% और महिलाओं का 1% है।

केदारनाथ की औसत साक्षरता दर 63% है: पुरुष साक्षरता 63% है और महिला साक्षरता 36% है। केदारनाथ में कोई भी आबादी छह साल से कम उम्र की नहीं है। हर साल मई से अक्टूबर तक तैरती आबादी प्रति दिन 5000 से अधिक है।

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