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श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shree Somnath Jyotirlingas)

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Somnath
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पवित्र सोमनाथ मंदिर सनातन का शाश्वत तीर्थस्थान है। इसीलिए कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर, प्रतीक है पुनर्निर्माण की उस शक्ति का जो हमेशा विनाश की शक्ति से अधिक पवित्र होती है।

इस संसार में हिंदू धर्म के अलावा शायद ही कोई अन्य देश या धर्म ऐसा होगा जिसकी संस्कृति ने पिछले 1500 सालों तक मात्र पतन ही झेला हो, और झेली हों अनेकों प्रकार की विपत्तियां।

तभी तो भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि-

‘‘पवित्र हिंदू धर्म और इसके पवित्र मंदिरों के विषय में गर्व से कहा जा सकता है कि यह धर्म और इसके मंदिर, प्रतीक है पुनर्निर्माण की उस शक्ति का जो हमेशा विनाश की शक्ति से अधिक पवित्र होती है।’’

पूरे भारत देश में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थित हैं।

इनमें सबसे पहला ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र नगर में अरब सागर के तट स्थित है और यह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि यह हर सृष्टि में यहां स्थित रहा है  सोमनाथ मन्दिर भूमण्डल में दक्षिण एशिया स्थित भारतवर्ष के पश्चिमी छोर पर गुजरात नामक प्रदेश स्थित, अत्यन्त प्राचीन व ऐतिहासिक शिव मन्दिर का नाम है।

यह भारतीय इतिहास तथा हिन्दुओं के चुनिन्दा और महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है।

इसे आज भी भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में माना व जाना जाता है।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बन्दरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में जयस्पष्ट है।

सोमनाथ मंदिर, अरब सागर के तट पर स्थित भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, वेरावल से 6 किमी दूर, शौरराष्ट्र, गुजरात में सदियों से वैदिक संस्कृति का केंद्र और प्रतीक है।

आर्य संस्कृति के प्राचीन काल से आसपास के क्षेत्र को प्रभास पाटन के नाम से जाना जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने यहां से वैकुंठ की यात्रा की, इस प्रकार प्रभाष पाटन भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ में बदल गया।

चंद्रमा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घातक तपस्या करता है।

भगवान शिव के आशीर्वाद से, इस क्षेत्र ने फिर से अपनी चमक प्राप्त की, इस प्रकार इसे “प्रभाष” कहा जाता है। स्कंद पुराण और महाभारत के अनुसार इस क्षेत्र का नाम नंदन, शिव, उग्रा, भदिरका, समिधान, कामध, वशवरूप, पद्मनाथ, मोक्षमार्ग, भास्कर तीर्थ, अर्कतीर्थ, सोमतीर्थ, हिरण्यसार आदि भी रखा गया था।

जैन शास्त्रों के अनुसार, इसे चंद्र प्रभा, चंद्र प्रभास, पट्टन आदि के नाम से जाना जाता था।

सौराष्ट्र सोमनाथं च श्रीशेले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं ममलेश्वरम् || परल्यां वैजनाथं च डोमेन्यां भीमाशंकरम्। सेतुबंधे तू रामेशं नागेशं दारुकावने || वरणस्यांतु विश्वेशं त्र्यम्बकण गौतमी तटे। हेमे तु केदारं ध्रुष्णेशं च शिवालय ||

श्री सोमनाथ जी के लिए अभिषेक का जल गंगा नदी से और कमल के पुष्प हमेशा कश्मीर से ही आते थे।

मध्य युग के प्रारंभकाल में भी यह मंदिर अति भव्य था। उस मंदिर में 56 स्वर्ण स्तंभ थे, और संपूर्ण मंदिर में अनगिनत कीमती रत्न और हीरे जड़े हुए थे।

अलबेरुनी और मार्कोपालो ने श्री सोमनाथ मंदिर का जो वर्णन किया था उसके अनुसार यह मंदिर अति संमृद्ध था। इस मंदिर के रखरखाव के लिए दस हजार गांव थे।

मंदिर के गर्भगृह में हीरे जवाहरत की भरमार थी। मंदिर में अनेकों सोने की मूर्तियां थीं। एक हजार से भी अधिक पूजारी भगवान की पूजा में हमेशा रहते थे।

शिवपुराण और नंदी उपपुराण में शिव ने कहा है कि मैं सभी जगह विशेषकर ज्योतिर्लिंगों के बारह रूपों और स्थानों पर उपस्थित हूं. सोमनाथ इन पवित्र स्थानों में से एक है.

 पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में विस्तार से बताई गई है।

चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।

श्री सोमनाथ मंदिर के अति प्राचीन दौर की बात करें तो पुराणों में उल्लेख मिलता है कि, सतयुग में चंद्र देव यानी स्वयं चंद्रमा ने यहां स्वर्ण या सोने का मंदिर बनवाया था।

त्रेता युग में स्वयं रावण ने यहां चांदी का मंदिर बनवाया था, और द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने यहां चंदन की लकड़ी से भगवान सोमनाथ जी का मंदिर बनवाया था।

यह मन्दिर हिन्दू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। अत्यन्त वैभवशाली होने के कारण इतिहास में कई बार यह मंदिर तोड़ा तथा पुनर्निर्मित किया गया।

वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरम्भ भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और पहली दिसम्बर 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

सोमनाथ मन्दिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक व पर्यटन स्थल है। मन्दिर प्रांगण में रात साढ़े सात से साढ़े आठ बजे तक एक घण्टे का साउण्ड एण्ड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मन्दिर के इतिहास का बड़ा ही सुन्दर सचित्र वर्णन किया जाता है।

लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्त्व बढ़ गया।

शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक , सोमनाथ मंदिर भी उत्तम वास्तुकला का नमूना है। अनन्त तीर्थ के रूप में जाना जाता है, यह वह स्थान माना जाता है जहां भगवान कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की।

 यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्रपद, कार्तिक माह में यहाँ श्राद्ध करने का विशेष महत्त्व बताया गया है।

इन तीन महीनों में यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है। इसके अलावा यहाँ तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्त्व है।

सोमनाथ का अर्थ है ” सोम के भगवान ” या “चंद्रमा”। इसे प्रभासा भी कहा जाता है (शाब्दिक रूप से “वैभव का स्थान”)।सोमनाथ मंदिर हिंदुओं के लिए एक ज्योतिर्लिंग स्थल और तीर्थ (तीर्थ) का एक पवित्र स्थान रहा है।

यह गुजरात में पास के द्वारका, ओडिशा में पुरी, तमिलनाडु में रामेश्वरम और चिदंबरम के साथ भारत के समुद्र तट पर पांच सबसे प्रतिष्ठित स्थलों में से एक है।

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर की सबसे खास बात यह रही कि यह मंदिर इतनी बार नष्ट होने और लूटने के बाद भी हमेशा धन-संपदा से समृद्ध होता रहा और आज भी है, जबकि इसको बार-बार निशाना बनाकर लुटने वाले उन्हीं मुगलों के वंश का आज पता ही नहीं चल पा रहा है कि वे कहां हैं और किस हाल में हैं या फिर वे समाप्त हो चुके

तीर्थ स्थान और मन्दिर  

मन्दिर संख्या 1 के प्रांगण में हनुमानजी का मन्दिर, पर्दी विनायक, नवदुर्गा खोडीयार, महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा स्थापित सोमनाथ ज्योतिर्लिग, अहिल्येश्वर, अन्नपूर्णा, गणपति और काशी विश्वनाथ के मन्दिर हैं।

अघोरेश्वर मन्दिर नं॰ 6 के समीप भैरवेश्वर मन्दिर, महाकाली मन्दिर, दुखहरण जी की जल समाधि स्थित है।

पंचमुखी महादेव मन्दिर कुमार वाडा में, विलेश्वर मंदिर नं. 12 के नजदीक और नं॰ 15 के समीप राममन्दिर स्थित है।

नागरों के इष्टदेव हाटकेश्वर मंदिर, देवी हिंगलाज का मन्दिर, कालिका मन्दिर, बालाजी मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, नागनाथ मन्दिर समेत कुल 42 मन्दिर नगर के लगभग दस किलो मीटर क्षेत्र में स्थापित हैं।

बाहरी क्षेत्र के प्रमुख मन्दिर         

सोमनाथ के निकट त्रिवेणी घाट पर स्थित गीता मन्दिर

वेरावल प्रभास क्षेत्र के मध्य में समुद्र के किनारे मन्दिर बने हुए हैं

शशिभूषण मन्दिर, भीड़भंजन गणपति, बाणेश्वर, चंद्रेश्वर-रत्नेश्वर, कपिलेश्वर, रोटलेश्वर, भालुका तीर्थ है। भालकेश्वर, प्रागटेश्वर, पद्म कुण्ड, पाण्डव कूप, द्वारिकानाथ मन्दिर, बालाजी मन्दिर, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, रूदे्रश्वर मन्दिर, सूर्य मन्दिर, हिंगलाज गुफा, गीता मन्दिर, बल्लभाचार्य महाप्रभु की 65वीं बैठक के अलावा कई अन्य प्रमुख मन्दिर है।

प्रभास खण्ड में विवरण है कि सोमनाथ मन्दिर के समयकाल में अन्य देव मन्दिर भी थे।

इनमें शिवजी के 135, विष्णु भगवान के 5, देवी के 25, सूर्यदेव के 16, गणेशजी के 5, नाग मन्दिर 1, क्षेत्रपाल मन्दिर 1, कुण्ड 19 और नदियाँ 9 बताई जाती हैं।

एक शिलालेख में विवरण है कि महमूद के हमले के बाद इक्कीस मन्दिरों का निर्माण किया गया। सम्भवत: इसके पश्चात भी अनेक मन्दिर बने होंगे।

सोमनाथ से करीब दो सौ किलोमीटर दूरी पर प्रमुख तीर्थ श्रीकृष्ण की द्वारिका है।

यहाँ भी प्रतिदिन द्वारिकाधीश के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

यहाँ गोमती नदी है। इसके स्नान का विशेष महत्त्व बताया गया है।

इस नदी का जल सूर्योदय पर बढ़ता जाता है और सूर्यास्त पर घटता जाता है, जो सुबह सूरज निकलने से पहले मात्र एक डेढ़ फीट ही रह जाता है।

अन्य दर्शनीय स्थल मन्दिर     

  1. अहिल्या बाई का मन्दिर
  2. प्राची त्रिवेदी
  3. वाड़ातीर्थ
  4. यादवस्थली

मंदिर का इतिहास

सोमनाथ मन्दिर का इतिहास काफी प्राचीन हैं। इस मंदिर का अस्तित्व कई ईसा पूर्व का है। मंदिर का पुनर्निर्माण दूसरी बार सातवीं सदी में  वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया था।

आठवीं सदी में इसे पुनः सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने अपनी  सेना को यहाँ भेज कर नष्ट कर दिया।

तीसरी बार इस मंदिर का पुनः निर्माण 815 ईस्वी में प्रतिहार राजा नागभट्ट ने कराया।

इस पवित्र मंदिर की कीर्ति दूर-दूर तक फ़ैलने लगी जिसका जिक्र अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में किया और इस मंदिर के बारे

माना जाता है कि समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर चार चरणों में भगवान सोम ने स्वर्ण, रवि ने चांदी, भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन और राजा भीमदेव ने पत्थरों से बनवाया था।

ऐतिहासिक तथ्यों से पता चलता है कि 11वीं से 18वीं सदी के दौरान कई मुस्लिम हमलावरों ने इस पर कई बार हमला किया।

हालांकि, लोगों के पुनर्निर्माण करने के उत्साह से यह मंदिर हर बार बनाया गया।

सोमनाथ मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी के ठंडे महीनों में है, हालांकि यह स्थल पूरे साल खुला रहता है। शिवरात्रि (आमतौर पर फरवरी या मार्च में) और कार्तिक पूर्णिमा (दीवाली के करीब) यहाँ बहुत उत्साह के साथ मनाई जाती है।

 सोमनाथ मंदिर की पौराणिक कथाएं

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा

सभी 12 ज्योतिर्लिंग, भगवान शिव का केंद्र और आत्मा पूरे भारत में फैले हुए हैं और इन पवित्र मंदिरों में पहला सोमनाथ मंदिर है।

स्कंद पुराण के अनुसार, महान ऋषि अत्रि मुनि और उनकी पत्नी अनसूया ने शांति और सुख की दुनिया बनाने के लिए सोचा था।

उन्होंने भगवान शिव की तपस्या शुरू की और फिर उन्हें बहादुर और समर्पित पुत्र का आशीर्वाद दिया।

यह पुत्र भगवान शिव का प्रसाद था और सुंदरता और विलासिता के साथ आया था जिसे चंद्र-चंद्र नाम दिया गया था।

वह अपने माता-पिता की इच्छा के अनुसार दुनिया बनाने के जुनून के साथ शांति, चमक, वीर, शक्ति और बुद्धि से भरा था।

चंद्रा ने लोगों के जीवन को बदलने और उन्हें संस्कारी बनाने के लिए बहुत प्रयास किए थे।

चंद्र की महिमा बहुत साल पहले भारतवर्ष में फैल गई थी माँ अनसूया ने चंद्रा से शादी के लिए अनुरोध किया लेकिन वह ऐसी पत्नी चाहते थे जो बुद्धिमान हो और उनके प्रयास को समझने में सक्षम हो।

अंत में चंद्र को रोहिणी नाम की महिला मिली, जो उन्हें समझने में कुशल थी, राजा दक्ष प्रजापति की बेटी।

रोहिणी शादी के लिए तैयार थी लेकिन इस शर्त के साथ कि चंद्रा को अपनी बाकी 26 बहनो के साथ शादी करनी होगी।

स्कंद पुराण के प्रभास खंड में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की यह कथा बताई गई है,चंद्रमा ने दक्ष की 27 पुत्रियों से विवाह किया था लेकिन रोहिणी से उनको इतना प्रेम था कि अन्य 26 खुद को उपेक्षित और अपमानित महसूस करने लगी थीं।

उन्होंने अपने पति से निराश होकर अपने पिता से शिकायत की, पुत्रियों की वेदना से पीड़ित दक्ष ने अपने दामाद चंद्रमा को दो बार समझाने का प्रयास किया परंतु चंद्रमा नहीं माने, प्रयास विफल हो जाने पर दक्ष ने चंद्रमा को ‘क्षयी’ होने का शाप दे दिया,चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। चंद्रमा भी बहुत दुखी और चिंतित थे।

सभी देवता चंद्रमा के दुख से व्यथित होकर ब्रह्मा जी के पास जाकर उनसे श्राप के निवारण का उपाय पूछने लगे।

ब्रह्मा जी ने प्रभास क्षेत्र में महामृत्युंजय के जाप से वृण्भध्वज शंकर की उपासना करना एक मात्र उपाय बताया।

चंद्रमा के 6 मास तक पूजा करने और घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जप किया।

इससे प्रसन्न होकर मृत्युंजय-भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वर प्रदान किया। उन्होंने कहा- ‘चंद्रदेव! तुम शोक न करो। मेरे वर से तुम्हारा शाप-मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति दक्ष के वचनों की रक्षा भी हो जाएगी।

कृष्णपक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कला क्षीण होगी, किंतु पुनः शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से तुम्हारी एक-एक कला बढ़ जाया करेगी।

इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम्हें पूर्ण चंद्रत्व प्राप्त होता रहेगा।’ चंद्रमा को मिलने वाले इस वरदान से सारे लोकों के प्राणी प्रसन्न हो उठे।

सुधाकर चन्द्रदेव पुनः दसों दिशाओं में सुधा-वर्षण का कार्य पूर्ववत्‌ करने लगे।

 शाप मुक्त होकर चंद्रदेव ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर मृत्युंजय भगवान्‌ से प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सदा के लिए प्राणों के उद्धारार्थ यहाँ निवास करें।

भगवान्‌ शिव उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके ज्योतर्लिंग के रूप में माता पार्वतीजी के साथ तभी से यहाँ रहने लगे।

उस क्षेत्र की महिमा बढ़ाने और चंद्रमा (सोम) के यश के लिए सोमेश्वर नाम से शिवजी वहां अवस्थित हो गए।

देवताओं ने उस स्थान पर सोमेश्वर कुंड  की स्थापना की। अतः इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है इसके दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप और दुष्कृत्यु विनष्ट हो जाते हैं।

वे भगवान्‌ शिव और माता पार्वती की अक्षय कृपा का पात्र बन जाते हैं।

मोक्ष का मार्ग उनके लिए सहज ही सुलभ हो जाता है। उनके लौकिक-पारलौकिक सारे कृत्य स्वयमेव सफल हो जाते हैं।

इस स्थान को ‘प्रभास पट्टन’  के नाम से भी जाना जाता है।

चूंकि चंद्रमा को भगवान शिव से सबसे पहले लाभकारी वरदान मिला था, इसलिए इस ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में मुख्य माना जाता है

एक दूसरे मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण भालूका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे तभी एक शिकारी ने उनके पैर के तलवे में पदचिन्ह को हिरण की आंख समझकर धोखे में तीर मारा था।

यहीं पर से भगवान श्रीकृष्ण ने अपना देह त्याग किया, और यहीं से वह बैकुंठ के लिए प्रस्थान कर गए। इस स्थान पर बड़ा ही सुंदर कृष्ण मंदिर भी बना हुआ है।

सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण

सोमनाथ मंदिर का जब भी जिक्र होता है, तो एक ही बात होती है कि इस मंदिर को कई बार लूटा गया और फिर से इस मंदिर का वैभव बरकरार है। 

कहा जाता है कि सोमनाथ मंदिर को 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण कराया गया.

श्री सोमनाथ के इस विशाल और पवित्र स्थान पर मुसलमानों ने अनेक हमले किए।

कहा जाता है कि यह मंदिर ईसा पूर्व में भी अवस्थित था।

सबसे पहले इस मंदिर पर 725 ईस्वी में सिंध के सूबेदार अल जुनैद ने हमला कर इसे तुड़वा दिया था और यहां से अनगिनत खजाना भी लूट ले गया था।

फिर राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण कराया था।

सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी ने 1024 ईस्वी में दूसरी बार तोड़ा. गजनवी ने न केवल शिवलिंग को ही तोड़ा, बल्कि हजारों बेकसूर लोगों को मौत के घाट भी उतार दिया था।

गजनवी का आक्रमण

महमूद ग़ज़नवी  ने सन 1024 में अपनी सेना के साथ हमला बोल दिया और मन्दिर में चढ़े सारे सोने-चाँदी  और हीरे-जवाहरातों को लूट लिया साथ ही मंदिर के अन्दर हज़ारो की संख्या में रहे भक्तो को मौत के घाट उतार दिया।

मंदिर को तहस-नहस कर दिया। उसके बाद वो लूटी गयी सम्पत्ति के साथ  अपने देश ग़ज़नी चला गया।

आज भी सोमनाथ मन्दिर का भग्नावशेष  समुद्र के किनारे विद्यमान है।

इतिहासकारो के अनुसार बताया जाता हैं की जब महमूद ग़ज़नवी सोमनाथ के शिवलिंग को खंडित (तोड़) ना सका तो वह गुस्से में शिवलिंग के चारो तरफ आग लगवा दी थी।

और मंदिर में ही स्थित नीलमणि के छप्पन खम्भों में जडित हीरे-मोती तथा विविध प्रकार के रत्न को लूट लिया और मंदिर को नष्ट कर दिया।

इतिहास गजनवी  की इस बर्बरता को कभी नहीं भुला सकता है. कहा जाता है कि उस दिन गजनवी ने 18 करोड़ का खजाना लूटा था और फिर अपने शहर गजनी (अफगनिस्तान) के लिए कूच कर गया था।

उसके बाद गुजरात के राजा भीमदेव और मालवा के राजा भोज के द्वारा इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था।

1093 ईस्वी में सिद्धराज जयसिंह  ने भी मंदिर निर्माण में सहयोग किया।

इस मंदिर के सौंदर्यीकरण में 1168 ईस्वी में सौराष्ट्र के राजा खंगार और विजयेश्वर कुमारपाल ने काफी सहयोग किया था।

खिलजीवंश का आक्रमण

इसके बाद 1297 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खान  ने गुजरात पर हमला कर फिर से सोमनाथ मंदिर को तोड़ा और मंदिर की अथाह धन-संपत्ति को लूटकर ले गया। फिर से हिन्दू राजाओं ने इसे बनवाया।

मुजफ्फरशाह ने इसे फिर किया ध्वस्त

1395 ईस्वी में जब गुजरात में मुजफ्फरशाह का शासन था, तब मुजफ्फरशाह ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ा और मंदिर का सारा धन लूट ले गया।

इसके बाद 1412 ईस्वी में मुजफ्फरशाह के बेटे अहमद शाह  ने फिर से सोमनाथ मंदिर को तोड़ा और लूटा।

मुगलवंश औरंगजेब ने भी लूटा खजाना

बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरंगजेब के काल में सोमनाथ मंदिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में।

1665 में मंदिर तुड़वाने के बाद जब औरंगजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया।

जब भारत का एक बड़ा हिस्सा मराठों के अधिकार में आ गया तब 1783 में इंदौर की रानी अहिल्याबाई द्वारा मूल मंदिर से कुछ ही दूरी पर पूजा-अर्चना के लिए सोमनाथ महादेव का एक और मंदिर बनवाया गया।

औरंगजेब ने पूजा-अर्चना करते हुए हजारों भक्तों को बेरहमी से मार दिया था।

आस्था ने मंदिर को वापस खड़ा किया

इतना सब होने के बाद भी हिंदुओं की आस्था का अंत नहीं हुआ था। वे उस स्थान की पूजा करते रहे। औरंगजेब ने 1706 ईस्वी में दोबारा सोमनाथ को तोड़ा और हजारों लोगों का कत्लेआम किया।

लेकिन फिर वीर शिवाजी महाराज के अदम्य साहस और अनेक युद्धों के बाद जब यह क्षेत्र मराठाओं के अधिकार में आया, तब 1783 ईस्वी में इंदौर की शिवभक्त रानी अहिल्याबाई ने मूल मंदिर से थोड़ा सा हटकर पूजा के लिए सोमनाथ महादेव का नया मंदिर बनवाया।

इस तरह से यह मंदिर कई बार ध्वस्त हुआ और फिर से खड़ा हुआ।

भारत की आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण

पुनर्निर्माण

भारत के लौह पुरुष और प्रथम उप प्रधान मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 नवंबर, 1947 को मंदिर के पुनर्निर्माण का वादा किया था।

आज का सोमनाथ मंदिर सातवें स्थान पर अपने मूल स्थान पर बना हुआ है। जब 1 दिसंबर 1995 को मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया, तब भारतीय राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने मंदिर को देश को समर्पित किया।

1951 में, जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग को शुद्ध करने का प्रस्ताव रखा, तो उन्होंने कहा, “सोमनाथ का यह मंदिर विनाश पर निर्माण पर विजय का प्रतीक है”।

मंदिर श्री सोमनाथ ट्रस्ट के तहत बनाया गया है और यह ट्रस्ट अब मंदिर की निगरानी कर रहा है।

वर्तमान में ट्रस्ट के अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल हैं और सरदार पटेल इस ट्रस्ट के पहले अध्यक्ष थे।

चालुक्य शैली द्वारा निर्मित कैलाश महामेरु प्रसाद मंदिर में गुजरात के सोमपुरा कारीगरों की कला का शानदार प्रदर्शन है। पिछले 800 सालों में इस तरह का निर्माण नहीं हुआ है।

तट पर संस्कृत में लिखे शिलालेख के अनुसार, मंदिर और ग्रह के दक्षिणी भाग के बीच केवल समुद्र मौजूद है और कोई भूमि नहीं है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के बाद गुजरात के महान शेर सपूत सरदार वल्लभभाई पटेल ने महाराष्ट्र के काकासाहेब गाडगी की सलाह पर श्री सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया था।

उनकी मृत्यु के बाद इसका निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था। भारतीय शिल्पकला की स्वर्गीय सुंदरता के इस बेजोड़ नमूने ने पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया.

भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी  के कर कमलों और वेदमूर्ति तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशीजी के वेदघोष द्वारा 11 मई 1951 को सुबह 6.46 बजे इस मंदिर में श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राणप्रतिष्ठा बड़ी धूमधाम से की गई।

ज्योतिर्लिंग का अर्थ

सोमनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से सबसे पहला ज्योतिर्लिंग है।

ज्योतिर्लिंग उन स्थानों को कहते है जहाँ भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए थे।

सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थान और पर्यटन स्थल है। हिंदू धर्म में इस स्थान को बहुत पवित्र माना जाता है।

इस मंदिर का निर्माण स्वयं चन्द्र देव ने करवाया था। इस मंदिर का इतिहास हिंदू धर्म के उत्थान और पतन का प्रतीक माना गया है।

अब तक यह मंदिर कई बार नष्ट हो चुका है और दूबारा उतनी ही विशालता से इसका पुननिर्माण किया गया।

सोमनाथ मंदिर की बनावट और शिल्प 

सोमनाथ मंदिर की अनूठी शिल्पकला एवं बनावट थी, जिसे आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया।

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण चालुक्य शैली में किया गया है। यह प्राचीन हिन्दू वास्तु कला का एक अनोखा नमूना है। पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिंग स्थापित किया है।

कैलाश महामेरु प्रासाद शैली में इस विशाल मंदिर को पूरी तरह से तैयार होने में कई वर्ष लग गए.

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 1 दिसंबर 1995 को सोमनाथ मंदिर को राष्ट्र को समर्पित किया।

सोमनाथ मंदिर तीन प्रमुख भागों- गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप में विभाजित है. इस मंदिर के शिखर की ऊंचाई 150 फीट है। शिखर पर अवस्थित कलश का वजन दस टन है। इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है.

सोमनाथ मंदिर का प्रांगण

इस विशाल मंदिर का क्षेत्रफल 10 किलोमीटर है। इस बड़े क्षेत्रफल में लगभग 42 मंदिर हैं, जिनमें पार्वती, लक्ष्मी, गंगा, सरस्वती और नंदी की मूर्तियां स्थापित हैं।

शिवलिंग से ऊपर अहल्येश्वर की बहुत सुंदर प्रतिमा अवस्थित है।

मंदिर प्रांगण में गणेश जी की खूबसूरत भव्य प्रतिमा स्थापित है. उत्तर द्वार के बाहर अघोरलिंग की मूर्ति है।

महाकाली और रानी अहिल्याबाई का भी बेहद सुंदर और विशाल मंदिर स्थापित है।

इसके अलावा गौरीकुंड नामक विशाल सरोवर भी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देता है.

सोमनाथ मंदिर के कुछ रोचक तथ्य

आमतौर पर सभी पर्यटन स्थलों और मंदिरों में कोई न कोई ऐसी विशेषता जरूर होती है जिसके कारण लोग उसे देखने के लिए जाते हैं। सोमनाथ मंदिर की भी अपनी विशेषता है।

 इस मंदिर के बारे में कुछ रोचक तथ्य क्या हैं।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सोमनाथ मंदिर में स्थित शिवलिंग में रेडियोधर्मी गुण है जो जमीन के ऊपर संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इस मंदिर के निर्माण में पांच वर्ष लग गए थे।

सोमनाथ मंदिर के शिखर की ऊंचाई 150 फीट है और मंदिर के अंदर गर्भगृह, सभामंडपम और नृत्य मंडपम है।

सोमनाथ मंदिर को महमूद गजनवी ने लूटा था जो इतिहास की एक प्रचलित घटना है। इसके बाद मंदिर का नाम पूरी दुनिया में विख्यात हो गया।

मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है जिसे बाणस्तंभ के नाम से जाना जाता है। इसके ऊपर तीर रखा गया है जो यह दर्शाता है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच पृथ्वी का कोई भाग नहीं है।

यहाँ पर तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का संगम है और इस त्रिवेणी में लोग स्नान करने आते हैं। मंदिर नगर के 10 किलोमीटर में फैला है और इसमें 42 मंदिर है।

सोमनाथ मंदिर को शुरूआत में प्रभासक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता था और यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपना देहत्याग किया था।

माना जाता है कि आगरा में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के ही है जिन्हें महमूद गजनवी अपने साथ लूट कर ले गया था। मंदिर के शिखर पर स्थित स्थित कलश का वजन 10 टन है और इसकी ध्वजा 27 फीट ऊँची है।

यह भारत के 12 ज्योतिर्लिंग में से पहला ज्योतिर्लिंग है इसकी स्थापना के बाद अगला ज्योतिर्लिंग वाराणसी, रामेश्वरम और द्वारका में स्थापित किया गया था। इस कारण शिव भक्तों के लिए यह एक महान हिंदू मंदिर माना जाता है।

पर्यटकों और भक्तों के लिए सोमनाथ मंदिर सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक खुला रहता है। मंदिर में तीन बार आरती होती है। इस अद्भुत आरती को देखने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

सोमनाथ मंदिर परिसर में ही रात साढ़े सात बजे से साढ़े आठ बजे तक लाइट एंड साउंड शो चलता है। ज्यादातर पर्यटक सोमनाथ मंदिर की वास्तुकला को देखने के लिए भी आते हैं।

चार धाम में से एक धाम भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका सोमनाथ से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पर प्रतिदिन द्वारकाधीश के दर्शन के लिए देश और विदेशों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

यहां गोमती नदी स्थित है इसके स्नान का विशेष महत्व बताया गया है इस नदी का जल सूर्योदय पर बढ़ जाता है और सूर्यास्त पर घट जाता है। जो सुबह सूर्य निकलने से पहल मात्र 1 या 2 फिट ही रह जाता है।

विश्व प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर आदि अनंत है। इसका सर्वप्रथम निर्माण काल अज्ञात है। हर काल में इस मंदिर को बुरी ताकतों ने लूटा और शिवलिंग को खंडित किया गया।

इन सबके बावजूद, आज भी अपने भक्तों के लिए सोमनाथ मंदिर में विराजित शिवलिंग और यह मंदिर पूरे भव्यता के साथ इस दुनिया के सामने खड़ा है।

यह मंदिर उन सभी बुरी ताकतों के लिए एक मिसाल है, और सबसे बड़ा उदाहरण है… जो यह दर्शाता है कि आखिर कितना भी अंधेरा हो, जीत हमेशा उजाले की ही होती है। और चाहे कितनी भी बुराई हो जीत हमेशा सच्चाई की ही होती है।

कालिदास की 5वीं शताब्दी की कविता रघुवंश में अपने समय के कुछ श्रद्धेय शिव तीर्थ स्थलों का उल्लेख है। इसमें बनारस (वाराणसी), महाकाल-उज्जैन , त्र्यंबक , प्रयाग , पुष्कर , गोकर्ण और सोमनाथ-प्रभास शामिल हैं। कालिदास की यह सूची “उनके दिनों में मनाए जाने वाले तीर्थों का स्पष्ट संकेत” देती है

कुछ ऐसी किंवदंतियां हैं जो इस पवित्र और स्थापत्य रूप से अद्भुत मंदिर से जुड़ी हैं:

आधुनिक दिन सोमनाथ मंदिर 1947 से 1951 तक पांच वर्षों में बनाया गया था और इसका उद्घाटन भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया था।

माना जाता है कि मंदिर में शिवलिंग अपने खोखलेपन के भीतर सुरक्षित रूप से छिपा हुआ था, प्रसिद्ध स्यामंतक मणि, दार्शनिक का पत्थर, जो भगवान कृष्ण से जुड़ा है।

कहा जाता है कि यह एक जादुई पत्थर था, जो सोने का उत्पादन करने में सक्षम था।

यह भी माना जाता है कि पत्थर में कीमिया और रेडियोधर्मी गुण होते हैं और यह अपने चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र बना सकता है जिससे इसे जमीन से ऊपर तैरते रहने में मदद मिलती है।

मंदिर का संदर्भ हिंदुओं के सबसे प्राचीन ग्रंथों जैसे श्रीमद भागवत, स्कंदपुराण, शिवपुराण और ऋग्वेद में मिलता है जो भारत में सबसे लोकप्रिय तीर्थ स्थलों में से एक के रूप में इस मंदिर के महत्व को दर्शाता है।

इतिहास के विद्वानों के अनुसार, सोमनाथ का स्थल प्राचीन काल से एक तीर्थ स्थल रहा है क्योंकि इसे तीन नदियों कपिला, हिरण और पौराणिक सरस्वती का संगम स्थल कहा जाता था।

संगम को त्रिवेणी संगम कहा जाता था और माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां चंद्रमा देवता सोम ने स्नान किया और अपनी चमक वापस पा ली।

इसका परिणाम समुद्र तट के इस स्थान पर चंद्रमा के ढलने और घटने या ज्वार के ढलने और घटने के रूप में माना जाता है।

किंवदंती यह है कि मंदिर की प्रारंभिक संरचना सबसे पहले चंद्रमा भगवान द्वारा बनाई गई थी जिन्होंने मंदिर का निर्माण सोने से किया था।

इसके निर्माण के लिए सूर्य देव ने चांदी का इस्तेमाल किया था, जबकि भगवान कृष्ण ने इसे चंदन की लकड़ी से बनाया था।

हिंदू विद्वान, स्वामी गजानंद सरस्वती के अनुसार, पहला मंदिर 7, 99, 25,105 साल पहले बनाया गया था, जैसा कि स्कंद पुराण के प्रभास खंड की परंपराओं से लिया गया था।

मंदिर 1024 में महमूद गजनी, 1296 में खिलजी की सेना, 1375 में मुजफ्फर शाह, 1451 में महमूद बेगड़ा और 1665 में औरंगजेब के हाथों नष्ट हो गया था।

कहा जाता है कि यह मंदिर ऐसी जगह पर स्थित है कि सोमनाथ समुद्र तट के बीच अंटार्कटिका तक सीधी रेखा में कोई भूमि नहीं है।

संस्कृत में एक शिलालेख में, सोमनाथ मंदिर में समुद्र-संरक्षण दीवार पर खड़े बाण-स्तंभ नामक तीर-स्तंभ पर पाया गया है कि मंदिर भारतीय भूमि के एक बिंदु पर खड़ा है, जो कि पहला बिंदु होता है उस विशेष देशांतर पर उत्तर से दक्षिणी ध्रुव की भूमि पर।

सोमनाथ मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियां मंदिर की भव्यता को दर्शाती है।

स्कंद पुराण के प्रभासखंड में उल्लेख किया गया है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम हर नए सृष्टि के साथ बदल जाता है।

इस क्रम में जब वर्तमान सृष्टि का अंत हो जाएगा और ब्रह्मा जी नई सृष्टि करेंगे तब सोमनाथ का नाम ‘प्राणनाथ’ होगा। प्रलय के बाद जब नई सृष्ट आरंभ होगी तब सोमनाथ प्राणनाथ कहलाएंगे।

मंदिर की दीवारों पर भगवान शिव के साथ ब्रह्मा और विष्णु की मूर्तियां विराजित है स्कंद पुराण के प्रभास खंड में पार्वती के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए महादेव कहते हैं कि अब तक सोमनाथ के आठ नाम हो चुके हैं।

सोमनाथ के सेवक नंदी महाराज मंदिर में विराजमान होकर शिव जी का ध्यान कर रहे हैं। स्कंद पुराण में बताया गया है कि सृष्टि में अब तक अब तक छह ब्रह्मा बदल गए हैं।

यह सातवें ब्रह्मा का युग है, इस ब्रह्मा का नाम है ‘शतानंद’। शिव जी कहते हैं कि स युग में मेरा नाम सोमनाथ है। बीते कल्प से पहले जो ब्रह्मा थे उनका नाम विरंचि था। उस समय इस शिवलिंग का नाम मृत्युंजय था।

महादेव का कहना है कि दूसरे कल्प में ब्रह्मा जी पद्मभू नाम से जाने जाते थे, उस समय सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का नाम कालाग्निरुद्र था। तीसरे ब्रह्मा की सृष्टि स्वयंभू नाम से हुई, उस समय सोमनाथ का नाम अमृतेश हुआ

सोमनाथ मंदिर के बारे में शिव जी कहते हैं कि चौथे ब्रह्मा का नाम परमेष्ठी हुआ, उन दिनों सोमनाथ अनामय नाम से विख्यात हुए। पांचवें ब्रह्मा सुरज्येष्ठ हुए तब इस ज्योतिर्लिंग का नाम कृत्तिवास था।

छठे ब्रह्मा हेमगर्भ कहलाए। इनके युग में सोमनाथ भैरवनाथ कहलाए।

स्कंद पुराण में एक अन्य संदर्भ के अनुसार, लगभग 6 ब्रह्मा हुए हैं। यह 7 वें ब्रह्मा का युग है जिसे शतानंद कहा जाता है।

भगवान शिव यह भी बताते हैं कि 7 वें युग में, मंदिर का नाम सोमनाथ और अंतिम युग में शिवलिंग को मृत्युंजय कहा जाता था।

धार्मिक मान्यता

भगवान सोमनाथ की पूजा दर्शन एवं उपासना से भक्तो को क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों से मुक्ति मिल जाती जाती और वो पूर्णत स्वस्थ हो जाता है।

क्युकी इस सोमेश्वर भगवान शिव साक्षात् यहाँ विराजमान हैं।

चन्द्रकुण्डं प्रसिद्ध च पृथिव्यां पापनाशनम्।

तत्र स्नाति नरो यः स सर्वेः पापैः प्रमुच्यते।।

रोगाः सर्वे क्षयाद्याश्च ह्वासाध्या ये भवन्ति वै।

ते सर्वे च क्षयं यान्ति षण्मासं स्नानमात्रतः।।

प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसं भवम्।

फलं प्राप्नोति शुद्धात्मा मृतः स्वर्गे महीयते।।

सोमलिंग नरो दृष्टा सर्वपापात्प्रमुच्यते ।

लब्धवा फलं मनोभीष्टं मृतः स्वर्गं समीहते।।

सोमनाथ मंदिर का विशेषता

इस मंदिर की विशेषता है कि अब तक यह 17 बार नष्ट हो चुका है और हर बार इसका पुननिर्माण किया गया। महमूद गजनवी से लेकर अलाऊद्दीन खिलजी तक सबने इस मंदिर को ध्वस्त किया।

भारत के स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मंदिर का पुननिर्माण करवाया।

यह मंदिर गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप- तीन प्रमुख भागों में विभाजित है।

इस मंदिर का शिखर 150 फुट ऊंचा है। इसके शिखर पर स्थित कलश का भार दस टन है और इसकी ध्वजा 27 फुट ऊंची है।  

इस वास्तु अनुकूलता के कारण यह मन्दिर भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है और साथ ही मंदिर में पर्याप्त धन का आगमन होता रहा है। इसलिए बार-बार ध्वस्त होने के बाद भी हर बार यह मन्दिर बनता रहा।

सोमनाथ मन्दिर के आसपास दो महत्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक स्थल है। जिस कारण से इस क्षेत्र का ओर भी महत्व बढ़ जाता है।

मन्दिर से पांच किमी. की दूरी पर भालका तीर्थ है, लोक कथाओं के अनुसार यहीं पर श्रीकृष्ण ने देहत्यागा था और एक किलोमीटर दूर तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है।

त्रिवेणी नदी में धार्मिक दृष्टि से स्नान का बहुत महत्व है, क्योंकि इसी त्रिवेणी पर श्रीकृष्ण जी की नश्वर देह का अग्नि संस्कार किया गया था।  

ऐसा माना जाता है की भगवान कृष्णा की सिमंतक  मणि सोमनाथ मंदिर के शिवलिंग में स्थापित है।

सोमनाथ मंदिर में पूजाअर्चना

यह मंदिर रोज सुबह 6 बजे से लेकर रात के 9 बजे तक भक्तो के लिए खुला रहता है। इस मंदिर में रोज तीन बार आरती होती है। सुबह 7 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम को 7 बजे आरती होती है।

इस मंदिर में होमात्मक अतिरुद्र, होमात्मक महारुद्र, होमात्मक लघुरुद्र, सवालक्ष सम्पुट महामृत्युंजय जाप आदि का किया जाता है।

इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1950 में दोबारा बनवाया था।

पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

इस मंदिर की महिमा को कई बार बार के हमले भी भक्तों के मन से हटा नहीं सके। सातवीं बार इस मंदिर को कैलाश महामेरू प्रासाद शैली में इसे बनवाया गया था जिसमें निर्माण कार्य से सरदार वल्लभभाई पटेल जुड़े रहे थे.

सोमनाथ मंदिर के पीछे समुद्र तट पर एक किलोमीटर लंबे समुद्र दर्शन पैदल-पथ का निर्माण, प्रसाद योजना के तहत किया गया जा रहा है।

इसे 47 करोड़ रुपये से अधिक की कुल लागत से विकसित किया गया है. पर्यटक सुविधा केंद्र’ के परिसर में विकसित सोमनाथ प्रदर्शनी केंद्र, पुराने सोमनाथ मंदिर के खंडित हिस्सों और पुराने सोमनाथ की नागर शैली के मंदिर वास्तुकला वाली मूर्तियों को प्रदर्शित करता है।

पुराने (जूना) सोमनाथ के पुनर्निर्मित मंदिर परिसर को श्री सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा 3.5 करोड़ रुपये के खर्च के साथ दुरुस्त किया गया है. साथ ही श्री पार्वती मंदिर का निर्माण 30 करोड़ रुपये के लागत से किया जाना प्रस्तावित है.

पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर गुजरात में हिंदुओं के लिए सबसे पसंदीदा तीर्थ स्थल है, जिसे अक्सर द्वारका की तीर्थयात्रा के साथ जोड़ा जाता है। डेविड सोफर कहते हैं, यह पूरे भारत से हिंदुओं को आकर्षित करती है।

सोमनाथ दर्शन का समय

मंदिर के खुलने का समय: सुबह 6:00 बजे से रात 10:00 बजे तक ।

आरती का समय: सुबह 7:00 बजे, दोपहर 12:00 बजे और शाम 7:00 बजे। दैनिक प्रदर्शन किया

साउंड एंड लाइटिंग शो का समय: रात 8:00 बजे से रात 9:00 बजे तक। दैनिक।

दर्शन का समय: सुबह 6:00 बजे से रात 9:30 बजे तक।

लाइव दर्शन का समय: सुबह 7:00 बजे से शाम 8:00 बजे तक

ड्रेस कोड: कोई भी अच्छा पहनावा। अभिषेक के दौरान पुरुषों को शर्ट और बनियान उतारनी चाहिए।

दर्शन अवधि: सप्ताह के दिनों में 20 से 30 मिनट और सप्ताहांत के दौरान 30 से 45 मिनट।

मुख्य देवता के दर्शन के लिए दर्शन टिकट की आवश्यकता नहीं है।

महाशिवरात्रि के दिनों में 12 दिवसीय वार्षिकोत्सव होगा। उपर्युक्त सोमनाथ दर्शन का समय त्योहार के दिनों में बदल सकता है।

जाने का सबसे अच्छा समय: सितंबर से मई पहला सप्ताह। कार्तिक मास, सोमवार, सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान भीड़ अधिक होगी।