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प्रकृति में बिखरे है आध्यात्म बिंदु, इन्हें अराधना में उतारे

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मानव जीवन में स्थितियां, परिस्थितियां, अनुकूलताएं-प्रतिकूलताएं उत्पन्न होती रहती हैं।

सेवा, सहायता, मंत्र जप, ईश्वर सिमरन, गुरू कृपा आशीर्वाद, ध्यान, देव दान, आश्रम दर्शन आदि आध्यात्मिक सद्कर्म कठिन अवस्थाओं में मन को समभाव में रखे रहने की शक्ति देते हैं।

शरीर की निर्मलता, मन की पवित्रता, आत्मा की शुद्धता बढ़ती है। अनन्तकाल से इस देश में ऋषियों द्वारा अनुसंधित ऐसे महत्वूपर्ण प्रयोग होते आये हैं, पर इनका प्रतिफल हमारी भाव दशा पर ही निर्भर करता है।


हम जैसी भाव मुद्राएं बनाएंगे, अंदर से व्यक्तित्व भी वैसा ही बनेगा।

आंतरिक हारमोंस भी वैसे ही काम करना शुरू कर देते है। हर भावदशा की अपनी हारमोंस ग्रंथि है अतः उसी भाव अनुरूप हारमोंस ग्रन्थि से प्रवाह फूटने लगता है।

ये भाव दशायें शरीर के रग-रग में तदनुरूप विशेष चुम्बकत्व पैदा करती हैं, जो ब्रह्मांड में फैले पड़े उन्हीं भावों के समान अनन्त सूक्ष्म तरंगों को अपनी ओर खींचने लगती हैं।

अन्ततः व्यक्ति का कायाकल्प होने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि हम सावधानी पूर्वक प्रकृति में बिखरे पड़े, दिव्य शांति संतोष, पुण्य, तृप्ति से भरे तंरगो को ही अपनी जीवन आराधना का विषय बनायें।

ऋषियों ने जीवन को आध्यात्मिक व्यवहार से जोड़ने वाले ऐसे सूत्र देकर हमें धन्य किया है।

हम प्रकृति को किन भावों से स्वीकारते हैं, इस पर ध्यान दें। हम अंदर उठने वाली आवाजों को सुनें, निश्चित ही शांति और पवित्रता का भाव बढ़ेगा।

सभी गुरू निर्देशित आध्यात्मिक कर्म भी आंतरिक व वाह्य प्रकृति प्रवाह से ही तो जोड़ते हैंे हमें। यह मंत्र ही लें, जो प्रकृति के साथ हमारे तादात्म्य का ही संदेश देता हैै।


आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।।
देवा नो यथा सद्मिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे।।


अर्थात् हे प्रभु! सब ओर से श्रेष्ठ ही संकल्प आएं। जो हीनता में दबने वाले न हों, जो किसी नकारात्मकता से घिरे हुए न हों, जो ऐस सत्य का उद्भेदन करने वाले हों, जिससे देवता हमारे लिए सदा उन्नति का अशीष दें और प्रतिदिन प्रमाद रहित होकर हमारे रक्षक बनें।

एक बात और कि हमारे देवता तब प्रमाद रहित होते हैं, जब हम अपने भाव-विचारों के दरवाजे प्रकृति के लिए खोल देते है। विराट पुरूष का ध्यान भी यही है।

इसके लिए हम श्रेष्ठ संकल्प, कल्याणकारी संकल्प करें। क्योंकि अभद्र संकल्प देवता स्वीकार नहीं करते, अतएव हमारे शुभ संकल्प ही आयें।

हाँ हमारे शुभ संकल्प बलवान भी होने चाहिए। किसी विरोधी शकित से दबने वाले न हों। सब गुत्थियों को सुलझाते हुए और सब बन्द किवाड़ों को खोलते हुए सफलता तक पहुंचाने वाले हों।

इसके लिए हमें अपने चित्त को संपूर्ण प्रकृति के शुभ प्रवाह पर ले जाना होगा। यही जीवन आराधना भी है। इस प्रकार कण-कण में समाये ईश्वरीय तत्व की अनुभूति से हम जुड़ें।

तब मंत्र जप, सिमरन, गुरूकृपा, ध्यान, देवदर्शन, दान, सेवा जैसे अध्यात्म बिन्दु भी हमारी श्रेष्ठ उन्नति करायेंगे।