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महर्षि भारद्वाज (Maharishi Bharadwaj)

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भारद्वाज प्राचीन भारतीय ऋषि थे। । चरक संहिता के अनुसार भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान पाया। ऋक्तंत्र के अनुसार वे ब्रह्मा, बृहस्पति एवं इन्द्र के बाद वे चौथे व्याकरण-प्रवक्ता थे।

उन्होंने व्याकरण का ज्ञान भी इन्द्र से प्राप्त किया था तो महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया। तमसा-तट पर क्रौंचवध के समय भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के साथ थे, वाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे। 

ऋग्वेद के मन्त्रों के सप्तद्रष्टाओं में अनन्यतम स्थान रखने वाले मन्त्र द्रष्टा महर्षि भरद्वाज (भारद्वाज) प्राचीन भारत के एक ऐसे महान विज्ञान वेत्ता व वैज्ञानिक थे, जिनके सरल, सहज व अति साधारण जीवन में लोकोपकारक विज्ञान की महान दृष्टि समाहित थी।

वैदिक ऋषियों में उच्च स्थान प्राप्त महर्षि भरद्वाज ऋषि अंगिरा के पौत्र व बृहस्पति के पुत्र माने जाते हैं। उनकी माता का नाम ममता था। अंगिरा के पुत्र बृहस्पति का पुत्र होने के कारण इन्हें अंगिरस भी कहा जाता है।

अंगिरा के सभी पुत्रों में बृहस्पति सबसे ज्ञानी होने के कारण बृहस्पति को देवताओं का गुरु होने का गौरव प्राप्त था। देवगुरु बृहस्पति की शुभा और तारा नाम की दो पत्नियाँ पूर्व से थीं, और उन्होंने ममता से तीसरी पत्नी के रूप में व्याह किया था, भरद्वाज बृहस्पति के इसी तीसरी पत्नी ममता के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए थे।

इनकी एक अन्य सन्तान भी थी, जिसका नाम था कच। भरद्वाज की पत्नी का नाम ध्वनि बताया जाता है। महर्षि भरद्वाज के दस पुत्रों में ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र ऋषि ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा हैं।

विद्वानों के अनुसार ये सभी भरद्वाज के विभिन्न पीढ़ियों के मन्त्र द्रष्टा ऋषि रहे हैं। उनकी एक पुत्री भी थी, जिसका नाम रात्रि था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है।

महर्षि भारद्वाज की अन्य दो पुत्रियाँ भी थीं, जिनमें से एक मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य से और दूसरी इडविडा (इलविला) विश्रवा मुनि से ब्याही गई थीं।

इन्हीं विश्रवा-इडविडा के पुत्र अर्थात अपने सौतेले भाई यक्षराज कुबेर से स्वर्ण-नगरी लंका ओर पुष्पक विमान को रावण ने छीन लिया था।

ॠग्वेद के षष्टम मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र अंकित हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र अंकित हैं।

भारद्वाज-स्मृति एवं भारद्वाज-संहिता के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने यन्त्र-सर्वस्व नामक बृहद ग्रन्थ की रचना की थी।

इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार कशिपा भारद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संतानें मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं।

वेदादि ग्रन्थों से लेकर रामायण, महाभारत ग्रन्थों तक सर्वत्र भरद्वाज परम्परा का उल्लेख प्राप्य है। लेकिन भरद्वाज सम्बन्धी इन उल्लेखों के अध्ययन से उनका जन्म वृतांत अत्यंत विचित्र प्रतीत होता है, और इनकी लम्बी अवधि तक अर्थात भारतीय परम्परा अनुसार एक युग से कई युगों तक उपस्थिति अर्थात जीवित रहने की कथाओं से स्पष्ट होता है कि यह सब वृतांत किसी एक भरद्वाज का नहीं, बल्कि कई भारद्वाजों का है।

अर्थात भरद्वाज वंश में पैदा हुए पृथक- पृथक  मुनि- भारद्वाजों के हैं। भरद्वाज एक जातिवाची नाम है, और वर्तमान में भी जैसे कोई जातिवादी नाम पीढ़ी दर पीढ़ी व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहकर चलता रहता है, वैसी ही भरद्वाज की परम्परा भी प्राचीन काल काल से चलती आ रही है।

ऋग्वेद, अथर्व वेदादि, उपनिषद ग्रन्थ और महाकाव्यों में तो भरद्वाज का उल्लेख है ही, भरद्वाज सम्बन्धी वृत्तांत श्रीमद्भागवत पुराण 8/27, मत्स्य-पुराण 49-15-33, ब्रह्म पुराण 2-38-27 और वायु पुराण 99-137, 148, 150, 169 में भी विस्तार से वर्णित है।

भरद्वाज के जन्म की विचित्र कथाएं पौराणिक ग्रन्थों में अंकित हैं। संसार के सर्वप्रथम ग्रन्थ ऋग्वेद में बृहस्पति के संदर्भ में अंकित वर्णन खगोलीय घटनाओं से जुड़ाव की ओर इशारा करता है।

इनकी पत्नी तारा के चन्द्रमा द्वारा अपहरण और उससे बुध की उत्पत्ति की पौराणिक कथा भी अपने में खगोल-शास्त्रीय रहस्य को छिपाये प्रतीत होता है।

आंगिरस गोत्र में उत्पन्न वैदिक ऋषि भरद्वाज स्वयं गोत्र प्रवर्तक तथा वैवस्वत मन्वन्तर के सप्त ऋषियों -कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज, में से एक हैं।

कुछ पुराणों में इन्हें बृहस्पति के बड़े भाई उतथ्य का पुत्र और बृहस्पति के तीसरी पत्नी ममता को बृहस्पति के बड़े भाई उतथ्य की पत्नी कहा गया है, परन्तु बाद में इन्हें बृहस्पति की पत्नी और भरद्वाज को उनका पुत्र बताया गया है।

यही कारण है कि पुराणों में इन्हें उतथ्य ऋषि का क्षेत्रज और बृहस्पति का औरस पुत्र बतलाया गया हैं। कथा के अनुसार ये देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे।

माता ममता और पिता बृहस्पति दोनों के द्वारा परित्याग कर दिये जाने पर मरुद्गणों ने इनका पालन किया। तब इनका एक नाम वितथ (विदथ) पड़ा।

जब राजा दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र सम्राट भरत का वंश डूबने लगा, तो उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु मरुत्सोम यज्ञ किया, जिससे प्रसन्न होकर मरुतों ने अपने पालित पुत्र भरद्वाज को उपहारस्वरूप भरत को अर्पित कर दिया।

भरत का दत्तक-पुत्र बनने पर ये ब्राह्मण से क्षत्रिय हो गये थे। भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राज -काज के साथ मन्त्र रचना कार्य भी किया। इनका निवास ब्रज क्षेत्र था।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक त्रेतायुग में भी उपस्थित थे, और वनवास के समय श्रीराम भरद्वाज आश्रम में गए थे।

भरद्वाज को त्रेता युग में श्रीराम से मिलने का सौभाग्य दो बार प्राप्त हुआ था। वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड 54/5 के अनुसार वन जाते समय और फिर लंका-विजय के पश्चात वापस लौटते समय श्रीराम भरद्वाज के आश्रम में गये थे।

वायुमार्ग से पुष्पक विमान से लौटते समय  श्रीराम महर्षि भरद्वाज के आश्रम का वर्णन करते हुए कहते हैं-

सुमित्रानन्दन! वह देखो प्रयाग के पास भगवान् अग्निदेव की ध्वजा रूप धूम उठ रहा है। मालूम होता है, मुनिवर भरद्वाज यहीं हैं।

महर्षि वाल्मिकी ने रामायण में अन्यत्र भी कहा है – श्रीराम ने चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया। तीर्थराज प्रयाग में संगम से थोड़ी दूरी पर इनका आश्रम था, जो आज भी विद्यमान है।

द्वापर युग में भी इनकी उपस्थिति रही है, और भरद्वाज धर्मराज युधिष्टिर के राजसूय-यज्ञ में भी आमंत्रित थे। महाभारत के अनुसार अजेय धनुर्धर तथा कौरवों और पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य इन्हीं के पुत्र थे।

भरद्वाज ने एक बार भ्रम में पड़कर अपने मित्र रैभ्य को शाप दे दिया और बाद में मारे शोक के जलकर प्राण त्याग दिये। परन्तु रैभ्य के पुत्र अर्वावसु ने इन्हें अपने तपोबल से जीवित कर दिया।

वायु पुराण के अनुसार आंगिरस की पन्द्रह शाखाओं में से शाखा प्रवर्तक मन्त्रदृष्टा ऋषि भरद्वाज आयुर्वेद शास्त्र के आदि प्रवर्तक भी हैं।

आयुर्वेद को इन्होंने आठ भागों में बाँटा था, जो अष्टांग आयुर्वेद के नाम से प्रचलित है। महर्षि ने इन आठों भागों को पृथक-पृथक कर इनका ज्ञान अपने शिष्यों को दिया था।

इन्होंने आयुर्वेद पर विश्व में प्रथम संगोष्ठी का आयोजन किया था। भाव प्रकाश के अनुसार आयुर्वेद एवं व्याकरण की शिक्षा इन्होंने इन्द्र से ली थी।

हरिवंश पुराण के अनुसार काशीराज दिवोदास और धन्वन्तरि इन्हीं के शिष्य थे। काशीराज देवदास के पुरोहित के रूप में उनके अगले तीन पुस्तों अर्थात प्रवर्द्धन और उनके पुत्र क्षात्र तक पुरोहित होने का उल्लेख मिलता है।

शुक्राचार्य के पास शरीर को रोगमुक्त की जा सकने वाली संजीवनी नामक ऐसी विद्या थी। बृहस्पति की तीसरी पत्नी ममता से उत्पन्न दुसरे पुत्र अर्थात भरद्वाज के सहोदर भाई कच ने उनसे यह संजीवनी विद्या प्राप्त की थी।

ऋक्तन्त्र नामक ग्रन्थ के अनुसार इंद्र, ब्रह्मा और बृहस्पति के बाद चौथे वैयाकरण के रुप में भी इनका नाम गिना जाता है ।

महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया। तमसा-तट पर क्रौंचवध के समय महर्षि भरद्वाज अपने गुरु महर्षि वाल्मीकि के साथ थे।

चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था। महर्षि भारद्वाज ने व्याकरण, आयुर्वेद संहिता, धनुर्वेद, राजनीति शास्त्र, यंत्र सर्वस्व, अर्थशास्त्र, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रन्थों की रचना की है।

तैतिरीय ब्राह्मण 3/10/11 के अनुसार ऋषि भरद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का ज्ञान इन्द्र और कालान्तर में भगवान श्रीब्रह्मा के द्वारा प्राप्त हुआ था।

अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर भरद्वाज ने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था। यही कारण है कि ऋषि भरद्वाज सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले ऋषियों में से एक माने गये थे।

और चरक ऋषि अपने सूत्र 1/26 में उन्हें अपरिमित आयु वाला बताने को विवश हुए थे। ऋग्वेद से लेकर पुराण तक उल्लिखित इन सभी वर्णनों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि ये सभी भरद्वाज (भारद्वाज) सम्बन्धी वर्णन कोई एक भरद्वाज के नहीं, बल्कि विभिन्न कालों में हुए अनेक भारद्वाजों के हैं, जो आदिसृष्टि काल अर्थात वैदिक काल से लेकर पौराणिक काल तक भरद्वाज की परम्परा में उत्पन्न भारद्वाजों के हैं, फिर भी इनके कार्य तो संसार के कल्याण के लिए अत्यंत कल्याण परक सिद्ध हुए हैं ।

महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं।

पर आज यंत्र सर्वस्व तथा शिक्षा ही उपलब्ध हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था।

चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।

कौन थे भरद्वाज ऋषि

भारद्वाज ऋषि के बारे में कहा जाता है कि वह बृहस्पति और ममता के सर्वश्रेष्ठ पुत्र थे. किन्हीं कारणों से माता-पिता द्वारा परित्याग किये जाने के पश्चात मरुद्गणों ने इनका पालन-पोषण किया|

एक बार राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र सम्राट भरत अपने वंश के विस्तार के लिए पुत्र प्राप्ति हेतु मरुत्सोम यज्ञ किया. इस यज्ञ से प्रसन्न होकर मरुद्गणों ने भरद्वाज को सम्राट भरत को भेंट कर दिया|

सम्राट भरत द्वारा गोद लिये जाने के पश्चात ये ब्राह्मण से क्षत्रिय बन गये थे. महर्षि भरद्वाज की दो पुत्रियां मैत्रेयी और इलविला थीं| मैत्रेयी का विवाह महर्षि याज्ञवल्क्य और इलविला का विश्रवा मुनि से हुआ था.

भारद्वाज का वंश

ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम ‘रात्रि’ था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है।

भारद्वाज के मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम हैं- ऋजिष्वा, गर्ग, नर, पायु, वसु, शास, शिराम्बिठ, शुनहोत्र, सप्रथ और सुहोत्र। ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार ‘कशिपा’ भारद्वाज की पुत्री कही गयी है।

इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संताने मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। भारद्वाज ऋषि ने बड़े गहन अनुभव किये थे। उनकी शिक्षा के आयाम अतिव्यापक थे।

भारद्वाज का विवाह सुशीला से हुआ था और उनका एक पुत्र था गर्ग और एक पुत्री देववर्षिणि ।

एक और इतिहासकार का मानना है की भारद्वाज जी की दो पुत्रिया थी इलविदा और कात्यायनी , जिन्होंने क्रमशय विश्रवा ऋषि और यज्ञावल्क्य से विवाह किया।

विष्णु पुराण की माने तो भरद्वाज जी एक अप्सरा पर मोहित हो गए थे जिसका नाम घृताची था ,और उससे एक परम योद्धा ब्राह्मण पैदा हुए थे द्रोणाचार्य।

इनकी पालक माता का नाम द्रोणी था और ये पत्ते के दोने पर पैदा हुए थे, इन दो करणो से द्रोण कहलाये।

प्रयागराज के पहले वासी थे भरद्वाज मुनि

चौपाई

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥

तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥

भावार्थ-

भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका राम के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीत चित्त, जितेंद्रिय, दया के निधान और परमार्थ के मार्ग में बड़े ही चतुर हैं।

ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे।

वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे।

ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है।

सबसे लंबी आयु वाले महर्षि थे भारद्वाज मुनि

बताया जाता है कि महर्षि भरद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का ज्ञान इन्द्र एवं श्री ब्रम्हा जी से प्राप्त हुआ था. अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर उन्होंने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था|

यही वजह है कि ऋषि भरद्वाज सर्वाधिक आयु वाले ऋषियों में से एक थे। चरक ऋषि ने उन्हें अपरिमित आयु वाला बताया है।

ऋषि भारद्वाज ने प्रयाग के अधिष्ठाता भगवान श्री माधव जो साक्षात श्री हरि हैं, की पावन परिक्रमा की स्थापना भगवान श्री शिव जी के आशीर्वाद से की थी।

ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री द्वादश माधव परिक्रमा सँसार की पहली परिक्रमा है। ऋषि भारद्वाज ने इस परिक्रमा की तीन स्थापनाएं दी हैं-

1-जन्मों के संचित पाप का क्षय होगा, जिससे पुण्य का उदय होगा।

2-सभी मनोरथ की पूर्ति होगी।

3-प्रयाग में किया गया कोई भी अनुष्ठान/कर्मकाण्ड जैसे अस्थि विसर्जन, तर्पण, पिण्डदान, कोई संस्कार यथा मुण्डन यज्ञोपवीत आदि, पूजा पाठ, तीर्थाटन,तीर्थ प्रवास, कल्पवास आदि पूर्ण और फलित नहीं होंगे जबतक स्थान देेेेवता अर्थात भगवान श्री द्वादश माधव की परिक्रमा न की जाए।

आयुर्वेद सँहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज सँहिता, राजशास्त्र, यँत्र-सर्वस्व(विमान अभियाँत्रिकी) आदि ऋषि भारद्वाज के रचित प्रमुख ग्रँथ हैं।

ऋषि भारद्वाज खाण्डल विप्र समाज के अग्रज है।खाण्डल विप्रों के आदि प्रणेता ऋषि

ऋषि जगाने के लिए ऋषि एक स्थान पर कहते हैं-अग्नि को देखो यह मरणधर्मा मानवों स्थित अमर ज्योति है। यह अति विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है।

यह अग्नि सब कार्यों में प्रवीणतम ऋषि है जो मानव में रहती है। उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिए। अतः स्वयं को पहचानो। भाटुन्द गाँव के श्री आदोरजी महाराज भारद्वाज गोत्र के थे।

उत्तराखंड के उप्रेती और पंचुरी ब्राह्मण भारद्वाज गोत्र ब्राह्मण व बरनवाल हैं। उत्तराखंड के डंगवाल रावत भरद्वाज गौत्र के क्षत्रिय है। पंचुरी ब्राह्मण वेदिक काल से उत्तराखंड में रहते हैं।

भारतीय व सनातन धर्मो के लिए ये सप्तऋषियों में से एक माने जाते है।

यह तो रहा महर्षि भरद्वाज का एक वैदिक एवं पौराणिक रूप( किन्तु व्यक्तित्व एवं कृतित्व की दृष्टि से उनके जीवन का जो दूसरा रूप है, वह है एक महान् तथा अद्वितीय वैज्ञानिक का।

वे जहाँ आयुर्वेद के धुरन्धर ज्ञाता थे, वहीं मंत्र, यंत्र और तंत्र तीनों क्षेत्रों में पारंगत थे। दिव्यास्त्रों से लेकर विभिन्न प्रकार के यन्त्र तथा विलक्षण विमानों के निर्माण के क्षेत्र में आज तक उन्हें कोई पा नहीं सका है।

उनके इस रूप के बारे में लोगों को शायद ही कोई जानकारी हो क्योंकि ऋषि-मुनि की हमारी कल्पना ही बड़ी विचित्र रही है।

महर्षि भारद्वाज रचितविमान शास्त्र

सर्वप्रथम विमान का निर्माण भरद्वाज मुनि ने किया था

ऋषि-मुनियों-तपस्वियों को लेकर हमारे मन-मस्तिष्क में जो दृश्य रेखांकित होता है, वह जटाजूटधारी, भगवा वस्त्र पहने, तिलक और रुद्राक्ष धारण किये, हवन कुण्ड के सामने यज्ञादि करते एक पवित्र व्यक्ति के रूप में होती है|

हम उनके उस पहलू को भूल जाते हैं, जो उनके वैज्ञानिक होने का पुख्ता एवं प्रामाणिक संकेत देते हैं. महर्षि भारद्वाज ऐसे ही सर्वगुण सम्पन्न ऋषि थे, जिनके पास विज्ञान तकनीक की महान दृष्टि भी थी|

महर्षि भारद्वाज के “यंत्र सर्वस्व” नामक ग्रंथ में तमाम किस्म के यंत्रों के बनाने तथा उनके संचालन का विस्तृत वर्णन किया गया है. इसके चालीसवें संस्करण में विमान संबंधित तमाम जानकारियां उल्लेखित हैं.

विमानशास्त्री महर्षि भरद्वाज

एक महान् आयुर्वेदज्ञ के अतिरिक्त भरद्वाज मुनि एक अद्भुत विलक्षण प्रतिभा-संपन्न विमान-शास्त्री थे। वेदों में विमान संबंधी उल्लेख अनेक स्थलों पर मिलते हैं।

ऋभु देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेख ऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है।

ऋभुओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उड़ने वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी पाया जाता है।

वाल्मीकि रामायण में वर्णित ‘पुष्पक विमान’ के नाम से तो प्राय: सभी परिचित हैं। लेकिन इन सबको कपोल-कल्पित माना जाता रहा है।

लगभग छह दशक पूर्व सुविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डॉ0 वामनराव काटेकर ने अपने एक शोध-प्रबंध में पुष्पक विमान को अगस्त्य मुनि द्वारा निर्मित बतलाया था, जिसका आधार `अगस्त्य संहिता´ की एक प्राचीन पाण्डुलिपि थी।

अगस्त्य के `अग्नियान´ ग्रंथ के भी सन्दर्भ अन्यत्र भी मिले हैं। इनमें विमान में प्रयुक्त विद्युत्-ऊर्जा के लिए `मित्रावरुण तेज´ का उल्लेख है।

महर्षि भरद्वाज ऐसे पहले विमान-शास्त्री हैं, जिन्होंने अगस्त्य के समय के विद्युत् ज्ञान को अभिवर्द्धित किया। तब उसकी संज्ञा विद्युत्, सौदामिनी, हलालिनी आदि वर्गीकृत नामों से की जाने लगी।

अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत शोध मण्डल ने प्राचीन पाण्डुलिपियों की खोज के विशेष प्रयास किये। फलस्वरूप् जो ग्रन्थ मिले, उनके आधार पर भरद्वाज का `विमान-प्रकरण´ प्रकाश में आया।

महर्षि भरद्वाज रचित `यन्त्र-सर्वस्व´ के `विमान-प्रकरण´ की यती बोधायनकृत वृत्ति (व्याख्या) सहित पाण्डुलिपि मिली, उसमें प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अत्यन्त महत्वपूर्ण तथा चामत्कारिक तथ्य उद्घाटित हुए।

सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा इस विमान-प्रकरण का स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक की हिन्दी टीका सहित सुसम्पादित संस्करण `बृहत् विमान शास्त्र के नाम से 1958 ई. में प्रकाशित हुआ।

यह दो अंशों में प्राप्त हुआ। कुछ अंश पहले बड़ौदा के राजकीय पुस्तकालय की पाण्डलिपियों में मिला, जिसे वैदिक शोध-छात्र प्रियरत्न आर्य ने `विमान-शास्त्र´ नाम से वेदानुसन्धान सदन, हरिद्वार से प्रकाशित कराया।

बाद में कुछ और महत्वपूर्ण अंश मैसूर राजकीय पुस्तकालय की पाण्डुलिपियों में प्राप्त हुए। इस ग्रंथ के प्रकाशन से भारत की प्राचीन विमान-विद्या संबंधी अनेक महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्यों का पता चला।

भरद्वाज प्रणीत `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रंथ तत्कालीन प्रचलित सूत्र शैली में लिखा गया है। इसके वृत्तिकार यती बोधायन ने अपनी व्याख्या में स्पष्ट लिखा है कि- महर्षि भरद्वाज ने वेद रूपी समुद्र का निर्मन्थन कर सब मनुष्यों के अभीश्ट फलप्रद `यन्त्रसर्वस्व´ ग्रन्थरूप् नवनीत (मक्खन) को निकालकर दिया

यंत्रसर्वस्व’ में लिखी है विमान बनाने और उड़ाने की कला

स्पष्ट है कि ‘यन्त्रसर्वस्व´ ग्रन्थ’ और उसके अन्तर्गत वैमानिक-प्रकरण की रचना वेदमंत्रों के आधार पर ही की गयी है। विमान की तत्कालीन प्रचलित परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए भरद्वाज ने बतलाया है कि `वेगसाम्याद् विमानोण्डजजानामिति´ अर्थात् आकाश में पक्षियों के वेग सी जिसकी क्षमता हो, वह विमान कहा गया है।

वैमानिक प्रकरण में आठ (8) अध्याय हैं, जो एक सौ (100) अधिकरणों में विभक्त और पाँच सौ (500) सूत्रों में निबद्ध हैं। इस प्रकरण में बतलाया गया है कि विमान के रहस्यों का ज्ञाता ही उसे चलाने का अधिकारी है ।

इन रहस्यों की संख्या बत्तीस (32) है। यथा-विमान बनाना, उसे आकाश में ले जाना, आगे बढ़ाना, टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना, वेग को कम या अधिक करना, लंघन (लाँघना), सर्पगमन, चपल परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियारहस्यग्रहण, शब्दप्रसारण, दिक्प्रदर्शन इत्यादि।

ये तो हुए विमानों के सामान्य रहस्य है। विभिन्न प्रकार के विमानों में चालकों को उनके विशिश्ट रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक होता था। `रहस्य लहरी´ नामक ग्रंथ में विमानों के इन रहस्यों का विस्तृत वर्णन है।

`वैमानिक प्रकरण´ के अनुसार विमान मुख्यत: तीन प्रकार के होते थे- 1. मान्त्रिक (मंत्रचालित दिव्य विमान), 2. तांत्रिक-औषधियों तथा शक्तिमय वस्तुओं से संचालित तथा, 3. कृतक-यन्त्रों द्वारा संचालित।

पुष्पक मांत्रिक विमान था। यह विमान मंत्रों के आधार पर चलता था। कह सकते हैं कि यह रिमोट पद्धति से चलता था। मान्त्रिक विमानों का प्रयोग त्रेता युग तक रहा और तांत्रिक विमानों का द्वापर तक।

इस श्रेणी में छप्पन (56) प्रकार के विमानों की गणना की गयी है। तृतीय श्रेणी कृतक के विमान कलियुग में प्रचलित रहे। ये विमान पच्चीस (25) प्रकार के गिनाये गये हैं। इनमें शकुन अर्थात पक्षी के आकार का पंख-पूँछ सहित, सुन्दर अर्थात धुएँ के आधार पर चलने वाला-यथा आज का जेट विमान, रुक्म अर्थात

आज का जेट विमान, रुक्म अर्थात खनिज पदार्थों के योग से रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभायुक्त लोहे से बिना विमान, त्रिपुर अर्थात जल, स्थल और आकाश तीनों में चलने, उड़ने में समर्थ आदि का उल्लेख आता है।

इन विमानों की गति अत्याधुनिक विमानों की गति से कहीं अधिक होती थी। विमानों और उनमें प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों को बनाने के काम में लाया जाने वाला लोहा भी

कई प्रकार को होता था। भरद्वाज ने जिन विमानों तथा यन्त्रों का उल्लेख अपने `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ में किया है, उनमें से अनेक तो ऐसे हैं, जिन्हें आज के समुन्नत वैज्ञानिक युग में भी नहीं बनाया जा सका है।

`शकुन´, `सुन्दर´ और `रुक्म´ के अतिरिक्त एक ऐसे भी विमान का वर्णन उक्त ग्रन्थ में है, जिसे न तो खण्डित किया जा सके, न जलाया जा सके और न ही काटा जा सके।

ऐसे विमानों का उल्लेख भी है, जिनमें यात्रा करने पर मनुष्य का शरीर जरा भी न हिले, शत्रु के विमान की सभी बातें सुनी जा सकें और यह भी ज्ञात किया जा सके कि शत्रु-विमान कहाँ तक कितने समय में पहुँचेगा।

विमान को हवा में स्थिर रखने (जैसे हैलीकॉप्टर) और कार की तरह बिना मुड़े ही पीछे जाने का उल्लेख है। (हवा में स्थिर रह सकने वाला हेलीकॉटर तो बना लिया गया है ( परन्तु कार की तरह बिना मुड़े पीछे की ओर गति कर सकने वाला विमान अभी तक नहीं बनाया जा सका है।)

महर्षि भरद्वाजकृत `यन्त्र-सर्वस्व´ ग्रन्थ के अतिरिक्त उन्हीं की लिखी एक प्राचीन पुस्तक `अंशुबोधिनी´ में अन्य अनेक विद्याओं का वर्णन हैं इसमे प्रत्येक विद्या के लिए एक-एक अधिकरण है।

एक अधिकरण में विमानों के संचालन के लिए प्रयुक्त होनेवाली शक्ति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया गया है। महर्षि के सूत्रों की व्याख्या करते हुए यती बोधायन ने आठ प्रकार के विमान बतलाये हैं-

1. शक्त्युद्गम – बिजली से चलने वाला।

2. भूतवाह – अग्नि, जल और वायु से चलने वाला।

3. धूमयान – गैस से चलने वाला।

4. शिखोद्गम – तेल से चलने वाला।

5. अंशुवाह – सूर्यरश्मियों से चलने वाला।

6. तारामुख – चुम्बक से चलने वाला।

7. मणिवाह – चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त मणियों से चलने वाला।

8. मरुत्सखा – केवल आयु से चलने वाला।

परमाणु-ऊर्जा विभाग के भूतपूर्व वैज्ञानिक जी0एस0 भटनागर द्वारा संपादित पुस्तक `साइंस एण्ड टेक्नालोजी ऑफ डायमण्ड में कहा गया है कि `रत्न-प्रदीपिका´ नामक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में कृत्रिम हीरा के निर्माण के विषय में मुनि वैज्ञानिक भरद्वाज ने हीरे और कृत्रिम हीरे के संघटन को विस्तार से बताया है।

पचास के दशक के अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी द्वारा पहले कृत्रिम हीरे के निर्माण से भी सहस्रों वर्ष पूर्व मुनिवर भरद्वाज ने कृत्रिम हीरा के निर्माण की विधि बतलायी थी। एकदम स्पष्ट है कि वे रत्नों के पारखी ही नहीं, रत्नों की निर्माण-विधि के पूर्ण ज्ञाता भी थे। भारद्वाज मुनि के इस वैज्ञानिक-रूप की जानकारी आज शायद ही किसी को हो।

विमान शास्त्र की टीका लिखने वाले बोधानन्द लिखते है

निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः ।  नवनीतं समुद्घृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम्‌ । प्रायच्छत्‌ सर्वलोकानामीप्सिताज्ञर्थ लप्रदम्‌ । तस्मिन चत्वरिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम्‌ ॥  नाविमानर्वैचित्र्‌यरचनाक्रमबोधकम्‌ ।  अष्टाध्यायैर्विभजितं शताधिकरणैर्युतम ।  सूत्रैः पञ्‌चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम्‌ ।  वैमानिकाधिकरणमुक्तं भगवतास्वयम्‌ ॥

अर्थात – भरद्वाज महामुनि ने वेदरूपी समुद्र का मन्थन करके यन्त्र सर्वस्व नाम का ऐसा मक्खन निकाला है , जो मनुष्य मात्र के लिए इच्छित फल देने वाला है ।

उसके चालीसवें अधिकरण में वैमानिक प्रकरण जिसमें विमान विषयक रचना के क्रम कहे गए हैं । यह ग्रंथ आठ अध्याय में विभाजित है तथा उसमें एक सौ अधिकरण तथा पाँच सौ सूत्र हैं तथा उसमें विमान का विषय ही प्रधान है ।

ग्रंथ के बारे में बताने के बाद बोधानन्द भरद्वाज मुनि के पूर्व हुए आचार्य व उनके ग्रंथों के बारे में लिखते हैं |  वे आचार्य तथा उनके ग्रंथ निम्नानुसार हैं ।

( १ ) नारायण कृत – विमान चन्द्रिका ( २ ) शौनक कृत न् व्योमयान तंत्र ( ३ ) गर्ग – यन्त्रकल्प ( ४ ) वायस्पतिकृत – यान बिन्दु + चाक्रायणीकृत खेटयान प्रदीपिका ( ६ ) धुण्डीनाथ – व्योमयानार्क प्रकाश

विमान की परिभाषा देते हुए अष् नारायण ऋषि कहते हैं जो पृथ्वी, जल तथा आकाश में पक्षियों के समान वेग पूर्वक चल सके, उसका नाम विमान है ।

शौनक के अनुसार- एक स्थान से दूसरे स्थान को आकाश मार्ग से जा सके ,

विश्वम्भर के अनुसार – एक देश से दूसरे देश या एक ग्रह से दूसरे ग्रह में जा सके

 भारद्वाज की शिक्षा      

भारद्वाज ने इन्द्र से व्याकरण-शास्त्र का अध्ययन किया था और उसे व्याख्या सहित अनेक ऋषियों को पढ़ाया था। ‘ऋक्तन्त्र’ और ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ दोनों में इसका वर्णन है।

भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद पढ़ा था, ऐसा चरक ऋषि ने लिखा है। अपने इस आयुर्वेद के गहन अध्ययन के आधार पर भारद्वाज ने आयुर्वेद-संहिता की रचना भी की थी।

भारद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र का उपदेश प्राप्त किया और ‘भारद्वाज-स्मृति’ की रचना की। महाभारत, तथा हेमाद्रि ने इसका उल्लेख किया है।

पांचरात्र-भक्ति-सम्प्रदाय में प्रचलित है कि सम्प्रदाय की एक संहिता ‘भारद्वाज-संहिता’ के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। महाभारत, शान्तिपर्व के अनुसार ऋषि भारद्वाज ने ‘धनुर्वेद’- पर प्रवचन किया था।

वहाँ यह भी कहा गया है कि ऋषि भारद्वाज ने ‘राजशास्त्र’ का प्रणयन किया था।कौटिल्य ने अपने पूर्व में हुए अर्थशास्त्र के रचनाकारों में ऋषि भारद्वाज को सम्मान से स्वीकारा है।

ऋषि भारद्वाज ने ‘यन्त्र-सर्वस्व’ नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने ‘विमान-शास्त्र’ के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और

ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन है। इस प्रकार एक साथ व्याकरणशास्त्र, धर्मशास्त्र, शिक्षा-शास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञानवेत्ता ऋषि भारद्वाज थे- इसे उनके ग्रन्थ और अन्य ग्रन्थों में दिये उनके ग्रन्थों के उद्धरण ही प्रमाणित करते हैं।

उनकी शिक्षा के विषय में एक मनोरंजक घटना तैत्तिरीय ब्राह्मण-ग्रन्थ में मिलती है। घटना का वर्णन इस प्रकार है- भारद्वाज ने सम्पूर्ण वेदों के अध्ययन का यत्न किया। दृढ़ इच्छा-शक्ति और कठोर तपस्या से इन्द्र को प्रसन्न किया। भारद्वाज ने प्रसन्न हुए इन्द्र से अध्ययन हेतु सौ वर्ष की आयु माँगी।

भारद्वाज अध्ययन करते रहे। सौ वर्ष पूरे हो गये। अध्ययन की लगन से प्रसन्न होकर दुबारा इन्द्र ने फिर वर माँगने को कहा, तो भारद्वाज ने पुन: सौ वर्ष अध्ययन के लिये और माँगा।

इन्द्र ने सौ वर्ष प्रदान किये। इस प्रकार अध्ययन और वरदान का क्रम चलता रहा। भारद्वाज ने तीन सौ वर्षों तक अध्ययन किया। इसके बाद पुन: इन्द्र ने उपस्थित होकर कहा-‘हे भारद्वाज!

यदि मैं तुम्हें सौ वर्ष और दे दूँ तो तुम उनसे क्या करोगे?’ भारद्वाज ने सरलता से उत्तर दिया, ‘मैं वेदों का अध्ययन करूँगा।’ इन्द्र ने तत्काल बालू के तीन पहाड़ खड़े कर दिये, फिर उनमें से एक मुट्ठी रेत हाथों में लेकर कहा-‘भारद्वाज, समझो ये तीन वेद हैं और तुम्हारा तीन सौ वर्षों का अध्ययन यह मुट्ठी भर रेत है।

वेद अनन्त हैं। तुमने आयु के तीन सौ वर्षों में जितना जाना है, उससे न जाना हुआ अत्यधिक है।’ अत: मेरी बात पर ध्यान दो- ‘अग्नि है सब विद्याओं का स्वरूप।

अत: अग्नि को ही जानो। उसे जान लेने पर सब विद्याओं का ज्ञान स्वत: हो जायगा, इसके बाद इन्द्र ने भारद्वाज को सावित्र्य-अग्नि-विद्या का विधिवत ज्ञान कराया।

भारद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत-तत्त्व प्राप्त किया और स्वर्गलोक में जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया’।इन्द्र द्वारा अग्नि-तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएँ कीं। आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे।

इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में ‘दीर्घजीवितम’ पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं।चरक ऋषि ने भारद्वाज को ‘अपरिमित’ आयु वाला कहा।भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था।

वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भारद्वाज ऋषि को ‘अनूचानतम’ और ‘दीर्घजीवितम’ या ‘अपरिमित’ आयु कहे जाने में कोई अत्युक्ति नहीं लगती है।

साम-गायक भारद्वाज ने ‘सामगान’ को देवताओं से प्राप्त किया था।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल में कहा गया है- ‘यों तो समस्त ऋषियों ने ही यज्ञ का परम गुह्य ज्ञान जो बुद्धि की गुफ़ा में गुप्त था, उसे जाना, परंतु भारद्वाज ऋषि ने द्युस्थान (स्वर्गलोक)-के धाता, सविता, विष्णु और अग्नि देवता से ही बृहत्साम का ज्ञान प्राप्त किया’। यह बात भारद्वाज ऋषि की श्रेष्ठता और विशेषता दोनों दर्शाती है।

‘साम’ का अर्थ है (सा+अम:) ऋचाओं के आधार पर आलाप। ऋचाओं के आधार पर किया गया गान ‘साम’ है। ऋषि भारद्वाज ने आत्मसात किया था ‘बृहत्साम’।

ब्राह्मण-ग्रन्थों की परिभाषाओं के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि ऋचाओं के आधार पर स्वर प्रधान ऐसा गायन जो स्वर्गलोक, आदित्य, मन, श्रेष्ठत्व और तेजस को स्वर-आलाप में व्यंजित करता हो, ‘बृहत्साम’ कहा जाता है। ऋषि भारद्वाज ऐसे ही बृहत्साम-गायक थे।

वे चार प्रमुख साम-गायकों-गौतम, वामदेव, भारद्वाज और कश्यप की श्रेणी में गिने जाते हैं। संहिताओं में ऋषि भारद्वाज के इस ‘बृहत्साम’ की बड़ी महिमा बतायी गयी है।

काठक-संहिता में तथा ऐतरेय-ब्राह्मण में कहा गया है कि ‘इस बृहत्साम के गायन से शासक सम्पन्न होता है तथा ओज, तेज़ और वीर्य बढ़ता है। ‘राजसूय यज्ञ’ समृद्ध होता है। राष्ट्र और दृढ़ होता है।] राष्ट्र को समृद्ध और दृढ़ बनाने के लिये भारद्वाज ने राजा प्रतर्दन से यज्ञ में इसका अनुष्ठान कराया था, जिससे प्रतर्दन का खोया राष्ट्र उन्हें मिला था’। 

प्रतर्दन की कथा महाभारत के अनुशासन पर्व में आयी है। भारद्वाज के विचार भारद्वाज कहते हैं अग्नि को देखो, यह मरणधर्मा मानवों में मौजूद अमर ज्योति है।

यह अग्नि विश्वकृष्टि है अर्थात् सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कर्मों में प्रवीणतम ऋषि है, जो मानव में रहती है, उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिये।

अत: पहचानो।  मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्ज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिये साहस और बल की आवश्यकता होगी।

इसके लिये आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें। ऋषि भारद्वाज कहते हैं- ‘हम झुकें नहीं। हम सामर्थ्यवान के आगे भी न झुकें। दृढ़ व्यक्ति के सामने भी नहीं झुकें।

क्रूर-दुष्ट-हिंसक-दस्यु के आगे भी हमारा सिर झुके नहीं’।ऋषि समझाते हैं कि जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिये कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें।

हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे, युद्धों में संरक्षण दे, इच्छित धनों का प्राप्त कराये और हमारी बुद्धियों को निन्दित मार्ग से रोके।

भारद्वाज ऋषि का विचार है कि हमारी सरस्वती, हमारी विद्या इतनी समर्थ हो कि वह सभी प्रकार के मानवों का पोषण करे। ‘हे सरस्वती! सब कपटी

करे। ‘हे सरस्वती! सब कपटी दुष्टों की प्रजाओं का नाश कर।’ हे सरस्वती! तू युद्धों में हम सबका रक्षण कर।  हे सरस्वती! तू हम सबकी बुद्धियों की सुरक्षा कर। 

इस प्रकार भारद्वाज के विचारों में वही विद्या है, जो हम सबका पोषण करे, कपटी दुष्टों का विनाश करे, युद्ध में हमारा रक्षण करे, हमारी बुद्धि शुद्ध रखे तथा हमें वाञ्छित अर्थ देने में समर्थ हो।

ऐसी विद्या को जिन्होंने प्राप्त किया है, ऋषि का उन्हें आदेश है- अरे, ओ ज्ञान को प्रत्यक्ष करने वाले! प्रजाजनों को उस उत्तम ज्ञान को सुनाओ और जो दास हैं, सेवक हैं, उनको श्रेष्ठ नागरिक बनाओ। ज्ञानी, विज्ञानी, शासक, कुशल योद्धा और राष्ट्र को अभय देने वाले ऋषि भरद्वाज के ऐसे ही तीव्र तेजस्वी और प्रेरक विचार हैं।

वनवासकाल के दौरान प्रयागराज के भरद्वाज आश्रम में रुके थे भगवान श्रीराम

भगवान राम भारतीय इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं, इसका एक प्रमाण प्रयागराज स्थित महर्षि भारद्वाज मुनि का आश्रम है, जो आज भी विद्यमान है|

रामचरित मानस और वाल्मिकी रामायण में उल्लेखित है कि श्रीराम का चौदह वर्ष के वनवास का पहला ठहराव प्रयागराज स्थित भरद्वाज आश्रम ही था.

भगवान राम भारतीय इतिहास का एक अहम हिस्सा हैं, इसका एक प्रमाण प्रयागराज स्थित महर्षि भारद्वाज मुनि का आश्रम है, जो आज भी विद्यमान है|

रामचरित मानस और वाल्मिकी रामायण में उल्लेखित है कि श्रीराम का चौदह वर्ष के वनवास का पहला ठहराव प्रयागराज स्थित भरद्वाज आश्रम ही था|

एक रात इस आश्रम में गुजारने के पश्चात महर्षि भरद्वाज जी से आशीर्वाद प्राप्त कर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को गंगा-यमुना-सरस्वती की त्रिवेणी में स्नान कर चित्रकूट के लिये प्रयाण किया था.

महर्षि भरद्वाज और उनके आश्रम का उल्लेख वेद और पुराणों के अलावा रामायण और श्रीरामचरित मानस में भी है|

भरद्वाज तपस्वी होने के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान, वेद पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद और विमान विज्ञान के भी गहरे जानकार थे. राजा दशरथ ने जब राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया, तब सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या छोड़ने के बाद भरद्वाज मुनि के आग्रह पर इसी आश्रम में उन्होंने कुछ समय गुजारा था|

भरद्वाज ऋषि ने ही श्रीराम को चित्रकूट में चौदह वर्ष गुजारने के लिए कहा था, क्योंकि यह स्थान हर दृष्टिकोण से शांत, सुरक्षित और प्रकृति सौंदर्य से भरपूर था.

श्रीराम के चित्रकूट प्रयाण के पश्चात जब भरत श्रीराम को वापस लाने के लिए चित्रकूट जा रहे थे, तब उन्होंने भी प्रयाग रुक कर भरद्वाज ऋषि का आशीर्वाद लिया था|

यही नहीं रावण का संहार कर श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या वापस लौट रहे थे, तब भी भरद्वाज ऋषि का आशीर्वाद लेने के लिए उन्होंने कुछ समय भरद्वाज आश्रम में ही बिताया था|

जानकारों के अनुसार यह त्रेता और द्वापर का संधिकाल का समय था. बताया जाता है कि इस आश्रम में भरद्वाज मुनि ने एक शिवलिंग की स्थापना की थी, इन्हें भरद्वाजेश्वर शिव कहा जाता है. आज भी यह शिव विग्रह भारद्वाज आश्रम में मौजूद है.

महर्षि भारद्वाज जी का आश्रम

महर्षि भारद्वाज का आश्रम प्रयाग में संगम तट पर अवस्थित था और यह आश्रम एक पाठशाला था, जिसमें विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।

उनके प्रयाग अवस्थित इस आश्रम की इतनी प्रसिद्धि थी कि प्रयाग को महर्षि भारद्वाज के नाम से ही जाना जाने लगा था। ऐसी मान्यता भी है कि प्रयाग को भरद्वाज ने ही बसाया है। प्रयाग में ही संगम तट पर संसार के सबसे बड़े गुरूकुल अर्थात विश्वविद्यालय की स्थापना कर भारद्वाज ने ही सर्वप्रथम शिष्यों को एकत्रित कर एक साथ शिक्षा देने का कार्य आरंभ किया, और लम्बी अवधि तक विद्या दान करते रहे।

वे स्वयं शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियांत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मन्त्र द्रष्टा थे, इसलिए उनके इस विश्वविद्यालय में जीवन की प्रत्येक समस्यायों के समाधान एवं आवश्यकताओं से सम्बन्धित विषयों का अध्यापन हुआ करता था, जिसमें शिक्षा, राजतंत्र ,अर्थशास्त्र ,शस्त्र विद्या, धनुर्वेद ,विधि ,अभियंत्रण ,विज्ञान और मंत्रों के दर्शन की शिक्षा प्रमुख थी।

महर्षि भरद्वाज की शिक्षा मानव जीवन के लिए अनिवार्य,उपयोगी तथा उत्कर्षक थी। आज का गुरुकुल अथवा विद्यालय-विश्ववद्यालय भी उन्ही की सोच, विचार का प्रतिफल है।

लेकिन अत्यंत खेद की बात है कि हम अपने महान पूर्वजों के भारतीय सभ्यता- संस्कृति के विकास, विद्या- ज्ञान के क्षेत्रों में किये गये योगदान को भूल बैठे हैं, और भारतीय सत्य ज्ञान को कपोलकल्पित मान पश्चिमी विद्वानों के अन्धानुकरण में लगे हैं।

भारतीय पुरातन ग्रन्थों में उपलब्ध इस सत्य इतिहास को स्वीकार कर भारतीय प्राचीन विज्ञानं वेत्ताओं में महान वैज्ञानिक भारद्वाज के लोकोपकारी विज्ञान, उत्कृष्ट शिक्षा पद्धति व वेदादि ज्ञान को सादर नमन, स्मरण किये बिना श्राद्ध पक्ष की सार्थकता सिद्ध होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।