बिरसा मुंडा को एक सम्मानित नेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने आदिवासी समुदायों को स्वतंत्रता के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। भगवान बिरसा मुंडा के नाम से जाने वाले बिरसा मुंडा, मुंडा जाति से संबंधित हैं।
इन्होंने अंग्रेज शासकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी एवं मुंडा आदिवासियों के हित की रक्षा की थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बिरसा मुंडा का एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है भारत के समृद्ध इतिहास में भगवान बिरसा मुंडा का नाम एक ऐसे वीर योद्धा और समाज-सुधारक के रूप में अंकित है, जिन्होंने अपने जीवन को जनजातीय समाज की उन्नति और उनके अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
देश में हर साल 15 नवम्बर को उनकी जयंती पर भारत में राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है। यह दिन न केवल उनकी शहादत और योगदान को याद करने का है, बल्कि यह जनजातीय समुदाय की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, अनवरत संघर्ष और स्वाभिमान का उत्सव भी है।बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को उलिहातु (अब झारखंड में) में एक मुंडा परिवार में हुआ था।
बिरसा मुंडा के प्रारंभिक जीवन के बारे में
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 में रांची के झारखंड में हुआ था। बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता एवं लोक नायक के रूप में जाने जाते थे।
मुंडा जाति से संबंध रखने के कारण उन्हें बिरसा मुंडा कहा जाता था। वह मुंडा जनजाति का हिस्सा थे, जो इलाके में एक प्रसिद्ध समूह है। उनके पिता सुगना मुंडा एक आध्यात्मिक नेता थे, और उनकी माँ करमी हातू उनके घर की देखभाल करती थीं।
बचपन में बिरसा को अपनी जनजाति की परंपराएँ बहुत पसंद थीं, वे उनकी भाषा सीखते थे, और उनके नृत्य, संगीत और संस्कृति का आनंद लेते थे। अपने समुदाय के जीवंत रीति-रिवाजों के बीच बड़े होने से उन्हें गर्व महसूस हुआ और उन्हें एहसास हुआ कि वे कौन हैं।
बिरसा मुंडा के शिक्षा के बारे में
बिरसा के पिता सुगना मुंडा धर्म प्रचारकों के सहयोगी थे, जिसके कारण से वे भी धीरे-धीरे धर्म प्रचारक के रूप में सामने उभर कर आए, बिरसा मुंडा ने अपने शुरुआती पढ़ाई जर्मन मिशन स्कूल चाईबासा से कि, ।
बिरसा मुंडा को अपनी जनजाति के रीति-रिवाजों और परंपराओं से बचपन से ही परिचित होना पड़ा, जिसका उनके जीवन और सोच पर गहरा असर पड़ा। वे आदिवासी लोगों के सामुदायिक जीवन से बहुत प्रभावित थे, जहाँ हर कोई जीवन की खुशियों और कठिनाइयों में समान रूप से हिस्सा लेता था।
निष्पक्षता और समानता के इस विचार ने बिरसा मुंडा को ब्रिटिश शासकों के कारण अपने लोगों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन को अपने समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताने-बाने के लिए एक खतरे के रूप में देखा और लोगों को इसका विरोध करने के लिए संगठित करने की कोशिश की।
उनका जीवन बेहद कठिनाइयों से भरा था और उन्हें बाल्यावस्था से ही आर्थिक संघर्षों का सामना करना पड़ा। सामाजिक असमानता, अत्याचार और विदेशी शासकों द्वारा जनजातियों पर निरंतर हो रहे शोषण ने बिरसा मुंडा के अंतर्मन को विद्रोह की भावना से भर दिया। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लागू जमींदारी प्रथा, धर्मांतरण और जनजातियों के पारम्परिक जीवन पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष किया।
बरसा मुंडा के द्वारा अनुयायियों को संगठित कर उन्हें दो दल बनाए थे जिसमें से एक दल उनके धर्म के प्रचार के लिए था और दूसरा राजनीतिक कार्य करने के लिए किया गया था। किसानों के शोषण को रोकने के लिए जमींदारों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी, भीड़ इकट्ठा होने के कारण बिरसा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, लेकिन गांव वालों ने उन्हें वापस छुड़वा लिया था जिसके बाद उनको दोबारा गिरफ्तार किया गया और हजारीबाग के जेल में बंद किया गया जहां वे एक करीब 2 साल तक कैद रहे।
आनंद पांडे से मिलने के बाद उन्होंने हिंदू धर्म और महाभारत के कई पात्रों के बारे में शिक्षा ली। 1985 में कुछ ऐसी अनोखी घटना हुई थी जिसके कारण इन्हें भगवान का अवतार माना गया। लोगों का इन पर इतना विश्वास हो गया था कि बिरसा के स्पर्श से ही शरीर के सभी रोग दूर होने लगे थे जिसके कारण से उन्हें भगवान बिरसा कहा जाने लगा।
जनजातियों के महानायक
आज बिरसा मुंडा को आदिवासियों के महानायक के रूप में याद किया जाता है, एक ऐसा महानायक जिसने अपने क्रांति से आदिवासियों को उनके अधिकार और उनमें सुधार लाने लिए संघर्ष किया. जब पूरा आदिवासी समाज ब्रिटिश शासकों ,जमींदारों, और जागीरदारों शोषण के तले दबा हुआ था, उस समय उन्होंने इस पूरे समाज को उठाने और एक नई जिंदगी देने का काम किया था।
आदिवासी विद्रोह के नायक बिरसा मुंडा
19वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेजों ने कुटिल नीति अपनाकर आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल करने लगे। हालाँकि आदिवासी विद्रोह करते थें, लेकिन संख्या बल में कम होने एवं आधुनिक हथियारों की अनुपलब्धता के कारण उनके विद्रोह को कुछ ही दिनों में दबा दिया जाता था।
यह सब देखकर बिरसा मुंडा विचलित हो गए, और अंततः 1895 में अंग्रेजों की लागू की गयी जमींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-जमीन की लड़ाई छेड़ दी। यह मात्र विद्रोह नहीं था।
यह आदिवासी अस्मिता, स्वायतत्ता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था। पिछले सभी विद्रोह से सीखते हुए, बिरसा मुंडा ने पहले सभी आदिवासियों को संगठित किया फिर छेड़ दिया अंग्रेजों के ख़िलाफ़ महाविद्रोह ‘उलगुलान’।
उलगुलान आंदोलन का नेतृत्व
बिरसा मुंडा जी ने “उलगुलान” नामक जनजातीय विद्रोह का नेतृत्व किया, जो अंग्रेजी शासन और उनके द्वारा किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ था। “उलगुलान” का अर्थ है ‘महान विद्रोह’। इस आंदोलन का उद्देश्य अंग्रेजों द्वारा लागू की गई भूमि नीतियों, जबरन धर्मांतरण और जनजातियों की पारम्परिक जीवनशैली में दखल देने वाले कानूनों के खिलाफ आवाज उठाना था।
भगवान बिरसा मुंडा के नेतृत्व में इस आंदोलन ने पूरे क्षेत्र में जनक्रांति की लहर पैदा कर दी और उन्हें “धरती आबा” या “धरती पिता” या धरा पितृ के रूप में सम्मानित किया जाने लगा।
आदिवासी पुनरुत्थान के जनक बिरसा मुंडा
धीरे-धीरे बिरसा मुंडा का ध्यान मुंडा समुदाय की गरीबी की ओर गया। आदिवासियों का जीवन अभावों से भरा हुआ था। और इस स्थिति का फायदा मिशनरी उठाने लगे थे और आदिवासियों को ईसाईयत का पाठ पढ़ाते थे।
कुछ इतिहासकार कहते हैं कि गरीब आदिवासियों को यह कहकर बरगलाया जाता था कि तुम्हारे ऊपर जो गरीबी का प्रकोप है वो ईश्वर का है। हमारे साथ आओ हमें तुम्हें भात देंगे कपड़े भी देंगे। उस समय बीमारी को भी ईश्वरी प्रकोप से जोड़ा जाता था।
20 वर्ष के होते होते बिरसा मुंडा वैष्णव धर्म की ओर मुड़ गए जो आदिवासी किसी महामारी को दैवीय प्रकोप मानते थे उनको वे महामारी से बचने के उपाय समझाते और लोग बड़े ध्यान से उन्हें सुनते और उनकी बात मानते थें।
आदिवासी हैजा, चेचक, साँप के काटने बाघ के खाए जाने को ईश्वर की मर्जी मानते, लेकिन बिरसा उन्हें सिखाते कि चेचक-हैजा से कैसे लड़ा जाता है। वो आदिवासियों को धर्म एवं संस्कृति से जुड़े रहने के लिए कहते और साथ ही साथ मिशनरियों के कुचक्र से बचने की सलाह भी देते।
धीरे धीरे लोग बिरसा मुंडा की कही बातों पर विश्वास करने लगे और मिशनरी की बातों को नकारने लगे। बिरसा मुंडा आदिवासियों के भगवान हो गए और उन्हें ‘धरती आबा’ कहा जाने लगा। लेकिन आदिवासी पुनरुत्थान के नायक बिरसा मुंडा, अंग्रेजों के साथ साथ अब मिशनरियों की आँखों में भी खटकने लगे थे। अंग्रेजों एवं मिशनरियों को अपने मकसद में बिरसा मुंडा सबसे बड़े बाधक लगने लगे।
षड्यंत्र कर 3 मार्च को बिरसा मुंडा को पकड़ लिया बिरसा पकड़े गए किंतु मई मास के अंतिम सप्ताह तक बिरसा और अन्य मुंडा वीरों के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था।
क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत सी धाराओं में मुंडा पकड़े गया थे, लेकिन बिरसा जानते थे कि उन्हें सजा नहीं होगी।
9 जून की सुबह सुबह उन्हें उल्टियाँ होने लगी, कुछ ही क्षण में वो बंदीगृह में अचेत हो गए। डॉक्टर को बुलाया गया उसने बिरसा मुंडा की नाड़ी देखी, वो बंद हो चुकी थी।
इतिहासकार कहते हैं कि अंग्रेज जानते थे कि बिरसा मुंडा कुछ ही दिनों में छूट जाएंगे, क्यों कि उनपर लगाई गई धाराओं के अंतर्गत उनके ऊपर दोष साबित नहीं किया जा सकता। वो ये भी जानते थे कि बिरसा मुंडा छूटने के बाद विद्रोह को वृहद रूप देंगे और तब यह अंग्रेजों के लिए और घातक होगा।
भगवान बिरसा मुंडा का समाज सुधारक के रूप में योगदान
भगवान बिरसा मुंडा केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक भी थे। उन्होंने तत्कालीन जनजातीय समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे अंध-विश्वास, जाति-भेद, नशाखोरी, जातीय संघर्ष और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता फैलाई।
उन्होंने अपने अनुयायियों को शिक्षा का महत्व समझाया और उन्हें एकता में रहने का संदेश दिया। बिरसा मुंडा ने “बिरसाइत” नामक एक धार्मिक आंदोलन भी चलाया, जिसमें उन्होंने अपने अनुयायियों को आचार-विचार की शुचिता, सादगी और सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया
बिरसाइत
बिरसा मुंडा ने बिरसाइत नामक एक नए धर्म की स्थापना की थी, जो जनजातीय संस्कृति और पहचान को बढ़ावा देने के लिए ।
बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज को बचाने और उनकी पहचान बनाए रखने के लिए बिरसाइत धर्म की शुरुआत की।
बिरसाइत धर्म के अनुयायी मांस, शराब, बीड़ी, खैनी जैसी नशीली चीजों का सेवन नहीं करते हैं। वे बाजार में बना हुआ भोजन नहीं खाते और न ही किसी अन्य जाति के व्यक्ति द्वारा पकाया भोजन ग्रहण करते हैं।
बिरसाइत धर्म के लोग गुरुवार को फूल, पत्ते और दातून तोड़ना भी वर्जित मानते हैं।
बिरसा मुंडा ने न केवल एक नए धर्म की स्थापना की, बल्कि उन्होंने जनजातीय समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाई और लोगों को जागरूक किया।
बिरसा मुंडा का भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन में योगदान
भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन में भगवान बिरसा मुंडा का योगदान अतुलनीय है। वे न केवल अपने क्षेत्र की जनजातियों के नेता थे, बल्कि उनके संघर्ष और बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को भी एक नई दिशा दी।
उनके “उलगुलान” आंदोलन ने अन्य जनजातीय समुदायों को भी संगठित किया और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी करने की प्रेरणा दी।
भगवान बिरसा मुंडा मात्र 24 साल 7 महीने की अल्पायु में 9 जून 1900 को वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी विरासत आज भी जनजातीय समाज के दिलों में जीवित है और उन्हें एक महान क्रांतिकारी जननायक के रूप में याद किया जाता है।
राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस की स्थापना
वर्ष 2021 में केन्द्र सरकार ने भगवान बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित किया। इसका उद्देश्य भगवान बिरसा मुंडा और अन्य जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान का सम्मान करना है।
इस दिन देशभर में जनजातीय समाज की सांस्कृतिक धरोहर, उनकी परंपराओं और उनके गौरवशाली इतिहास को समझने और सम्मानित करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यह दिवस जनजातीय समाज के संघर्षों और उनके योगदान को याद करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस का महत्व
राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस का महत्व केवल बिरसा मुंडा जी के योगदान को याद करने तक सीमित नहीं है। यह जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का जश्न मनाने का भी दिन है।
जनजातीय समाज ने भारत के इतिहास में अहम भूमिका निभाई है। यह गौरव दिवस उनकी सांस्कृतिक धरोहर, संघर्षों और उपलब्धियों का सम्मान करता है। यह अवसर सभी भारतीयों को यह याद दिलाने का भी है कि जनजातीय समाज भारत की संस्कृति का एक महत्वपूर्ण व अभिन्न हिस्सा है और उनके योगदान को हमें सदैव संजोकर रखना चाहिए।
भगवान बिरसा मुंडा का जीवन प्रेरणा का स्रोत है, जो हमें साहस, संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का संदेश देता है। राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस हमें उनकी शिक्षाओं, राष्ट्रप्रेम और उनके संघर्ष को याद करने और जनजातीय समाज के अधिकारों और सम्मान के प्रति संवेदनशील बने रहने के लिए प्रेरित करता है।
जनजातीय समाज के स्वाभिमान और उनके अधिकारों की रक्षा में भगवान बिरसा मुंडा का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। राष्ट्रीय जनजातीय गौरव दिवस उनके प्रति हमारी कृतज्ञता, आदर और श्रृद्धांजलि का प्रतीक है।
मुंडा विद्रोह के पीछे कारण:
सामंती जमींदारी व्यवस्था : अंग्रेजों ने जनजातीय खुंटकट्टी व्यवस्था को सामंती जमींदारी व्यवस्था से बदल दिया, जिसने जनजातीय समुदायों की पारंपरिक भूमि-बंटवारे की प्रथाओं को बाधित कर दिया, उन्हें हाशिए पर डाल दिया और उनके भूमि अधिकारों को कमजोर कर दिया।
जबरन श्रम और शोषण: अंग्रेजों ने मुंडाओं पर जबरन श्रम थोपा, उन्हें कठोर परिस्थितियों में बागानों, खदानों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में काम कराया, साथ ही उच्च करों और ऋण के माध्यम से उनका शोषण भी किया।
बाहरी लोगों (दीकू) का प्रवेश: ब्रिटिश नीतियों ने गैर-आदिवासी बसने वालों और जमींदारों का पक्ष लिया, जिससे आदिवासियों को समान अधिकारों और न्याय तक पहुंच से वंचित कर दिया गया, जिससे वे और अधिक अलग-थलग पड़ गए।
मिशनरी गतिविधियाँ: ब्रिटिश समर्थित ईसाई मिशनरियों ने आदिवासी लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन करने का प्रयास किया, जिससे आदिवासी समुदायों में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आक्रोश पैदा हुआ।
मुंडा विद्रोह:
बिरसा मुंडा ने पारंपरिक मुंडा मान्यताओं को सामाजिक न्याय और धार्मिक पुनरुत्थान के अपने दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए विद्रोह का नेतृत्व किया।
- जन-आंदोलन: बिरसा ने पूरे क्षेत्र में हजारों आदिवासी लोगों को औपनिवेशिक उत्पीड़न के खिलाफ उठने के लिए प्रेरित किया।
- सशस्त्र विद्रोह: इस विद्रोह में ब्रिटिश कार्यालयों, पुलिस स्टेशनों और जमींदारों की जागीरों पर हमले हुए, क्योंकि मुंडा सेना अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी।
- दमन: अंग्रेजों ने बलपूर्वक विद्रोह को कुचल दिया और बिरसा मुंडा को पकड़ लिया, जिनकी 1900 में कैद में रहस्यमय तरीके से मृत्यु हो गई।
मुंडा विद्रोह की उपलब्धियां:
- जागरूकता: इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन के तहत आदिवासी समुदायों के सामने आने वाले अन्याय के बारे में जागरूकता पैदा की।
- जनजातीय अधिकार: इसमें जनजातीय भूमि और संसाधनों को शोषण से बचाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
- छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908: यह अधिनियम विद्रोह का प्रत्यक्ष परिणाम था। इसने आदिवासी भूमि को बाहरी लोगों को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध लगा दिया, सामूहिक भूमि स्वामित्व की खुंटकट्टी प्रणाली को मान्यता दी और जबरन मजदूरी (वेथ बिगारी) को समाप्त कर दिया।
महत्व:
बिरसा मुंडा का आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक महत्वपूर्ण आदिवासी संघर्ष था। उन्होंने आदिवासी अधिकारों और स्वायत्तता के लिए आवाज उठाई। उनकी कहानी आज भी आदिवासी समुदायों और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में प्रेरणा का स्रोत है। झारखंड में 15 नवंबर को “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाया जाता है, जो बिरसा मुंडा के जन्मदिन के उपलक्ष्य में है।
महान व्यक्ति बिरसा मुंडा की मृत्यु और विरासत
बिरसा मुंडा की मृत्यु 9 जून 1900 को, मात्र 25 वर्ष की आयु में, ब्रिटिश हिरासत में हुई थी। उन्हें मुंडा विद्रोह को दबाने के लिए पकड़ा गया था, लेकिन उनकी मृत्यु का असली कारण अभी भी अस्पष्ट है।
विद्रोह की प्रतिमा: “विद्रोह की प्रतिमा” बिरसा मुंडा की विरासत का सम्मान करती है। 2021 में, रांची की पुरानी सेंट्रल जेल में एक संग्रहालय खोला गया, जहाँ उनकी मृत्यु हुई थी। प्रतिमा में उन्हें पारंपरिक आदिवासी पोशाक में दिखाया गया है, जिसमें धनुष और तीर जैसे हथियार हैं, जो उनके नेतृत्व और विद्रोह का प्रतीक है।
भगवान बिरसा मुंडा
बिरसा मुंडा को आम तौर पर ‘धरती आबा’ के नाम से जाना जाता है, जिसका मतलब है ‘पृथ्वी पिता’। उनके कुछ भक्त उन्हें देवता मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं।
हालाँकि, हर कोई इस उपाधि का इस्तेमाल नहीं करता। कई लोगों के लिए, यह सम्मान दिखाने और उनके महत्वपूर्ण योगदान को याद करने का एक तरीका है। संक्षेप में, बिरसा मुंडा झारखंड के आदिवासी समुदायों के बीच एक पूजनीय और वीर व्यक्ति हैं।
वे अंग्रेजों के खिलाफ उनके प्रतिरोध और भारत के ऐतिहासिक संदर्भ में न्याय और अधिकारों की उनकी खोज का प्रतीक हैं।
बिरसा मुंडा हवाई अड्डा रांची
बिरसा मुंडा हवाई अड्डा भारत के झारखंड की राजधानी रांची में है। इसका नाम बिरसा मुंडा के नाम पर रखा गया है, जो एक आदिवासी नायक थे जिन्होंने बहुत पहले अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। हवाई अड्डे का प्रबंधन भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण द्वारा किया जाता है और यह देश और विदेश से उड़ानों को संभालता है।
हवाई अड्डे पर आने और जाने वाले यात्रियों के लिए एक इमारत है। इसमें वाई-फाई, एटीएम, बैगेज कार्ट और फ़ूड कोर्ट जैसी उपयोगी चीजें हैं। हवाई अड्डा हर साल 1 मिलियन से ज़्यादा यात्रियों का स्वागत कर सकता है।
बिरसा मुंडा पार्क
बिरसा मुंडा पार्क, रांची, झारखंड, भारत में स्थित है, जो मौज-मस्ती और आराम के लिए 400 एकड़ का एक बड़ा स्थान है। इसका नाम बिरसा मुंडा के नाम पर रखा गया है, जो एक आदिवासी नेता थे जिन्होंने 19वीं सदी के अंत में अंग्रेजों का बहादुरी से विरोध किया था।
पार्क में सभी के लिए करने के लिए बहुत कुछ है, जिसमें बोटिंग और पानी के मज़े के लिए एक बड़ी झील है। यहां पैदल चलने और जॉगिंग के रास्ते हैं, साथ ही बाहर घूमने के शौकीन लोगों के लिए साइकिल चलाने के रास्ते भी हैं।
रोमांच पसंद करने वालों के लिए पार्क में बड़े पहिये, रोलर कोस्टर और टॉय ट्रेन जैसी सवारी उपलब्ध हैं। बच्चों के लिए झूले, स्लाइड और अन्य मजेदार गतिविधियों वाला एक विशेष खेल क्षेत्र
- आदिवासी अस्मिता के प्रतीक भगवान बिरसा मुंडा
- यजल—जंगल—जमीन का संरक्षण करने के लिए भगवान बिरसा मुंडा को याद किया जाना चाहिए, बल्कि आदिवासी संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता के रक्षक के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में भी वे हमेशा पूज्य रहेंगे।
- भगवान बिरसा मुंडा का जीवन संघर्ष, साहस और स्वाभिमान का ऐसा प्रतीक है जो भारत भर के वंचितों और पिछड़ों को राह दिखाते हैं। भगवान बिरसा मुंडा के दुनिया में अवतरण के 150वें वर्ष पर, हम उनके रूप में एक ऐसे नायक को नमन करते हैं जिन्होंने न केवल आदिवासी समाज की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा की।
- बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी अपना अनूठा और अविस्मरणीय योगदान प्रभावी रूप से दिया। उनकी ओर से जल, जंगल, जमीन के अधिकारों के लिए लड़ाई ने उन्हें ‘धरती आबा’ का विशिष्ट सम्मान दिलाया। यही वजह रही कि न केवल आदिवासी समाज बल्कि तमाम वंचितों, पिछड़ों और दलितों—दमितों के लिए वे भगवान बन गए।
- भगवान बिरसा मुंडा की महान विरासत आज भी वंचित, शोषित और पिछड़े वर्गों के लिए प्रेरणा का अनूठा स्त्रोत है। उनकी यही महान विरासत हर किसी को अपने हक के लिए खड़े होने का साहस और प्रेरणा देती है।
- भगवान बिरसा मुंडा केवल आदिवासी समाज के ही नहीं महानायक थे। बल्कि वे उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में अपनी अमिट और अनूठी छाप छोड़ी। भगवान बिरसा मुंडा का जीवन और संघर्ष उस समय के भारतीय समाज और आदिवासी समुदाय के साहस का प्रतीक है।
- जब अंग्रेजी हुकूमत आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन से दूर करने का कुचक्र रच रही थी। तब भगवान बिरसा मुंडा जी ने न केवल इस षड्यंत्र के खिलाफ आवाज उठाई। बल्कि उन्होंने अदम्य इच्छाशक्ति और संघर्ष के बल पर आदिवासियों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में उभरे।
- उन्हीं की प्रेरणा और आह्वान पर लाखों आदिवासियों ने भारत की महान थांती की रक्षा का साहस जुटाया।
19वीं शताब्दी के अंत में ही अंग्रेजों की जमींदारी प्रथा ने आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों से दूर करना शुरू कर दिया। अंग्रेज भारत की वन संपदा और प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता जानते थे और उन्होंने इसे कब्जे करने की कोशिशों को अपनी कुत्सित मंशा के अनुसार मूर्त रूप देना शुरू किया।
भगवान बिरसा मुंडा इस चाल को समझे और उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संकल्प किया। उन्होंने देखा कि अंग्रेज न केवल आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन पर कब्जा जमा रही थी। बल्कि आदिवासियों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक स्वतंत्रता को भी खतरे में डाल रही थी।
इसके खिलाफ उन्होंने आदिवासी विद्रोह का आह्वान किया, जिसे ‘उलगुलान’ कहा गया। यह सिर्फ एक विद्रोह नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता और स्वायत्तता की रक्षा का संग्राम था। उन्होंने आदिवासियों को संगठित किया और उन्हें उनकी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया।
- भगवान बिरसा मुंडा ने सनातन वैष्णव धर्म की ओर झुकाव रखते हुए आदिवासियों को उनके पारंपरिक रीति-रिवाजों, धर्म और संस्कृति से जोड़ने का काम किया। उन्हें ‘धरती आबा’ कहा जाने लगा,
- और वे आदिवासियों के लिए भगवान बन गए। उनकी शिक्षाओं का प्रभाव यह हुआ कि आदिवासी मिशनरियों के चंगुल से बाहर आने लगे।
- आदिवासी निश्चित रूप से अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की ओर लौटने लगे। भगवान बिरसा मुंडा आदिवासियों को बताते थे कि हैजा, चेचक जैसी बीमारियाँ ईश्वर का प्रकोप नहीं, बल्कि इलाज योग्य रोग हैं। बिरसा ने आदिवासियों के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य के महत्व को प्रभावी रूप से बढ़ावा दिया।
बिरसा मुंडा का जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत है,
- भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार ने 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मान्यता दी है। यह दिन न केवल बिरसा मुंडा के योगदान को याद करने का अवसर है, बल्कि आदिवासी समाज के सभी स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति को भी संजोने का दिन भी है। जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, उन्हें याद करने का दिन है।
- भगवान बिरसा मुंडा का जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणास्त्रोत है, विशेषकर आदिवासी समाज के लिए। उनके बलिदान को सदियों तक याद रखा जाएगा और उनकी गौरवगाथा से न केवल भारत का इतिहास बल्कि हर संघर्षशील व्यक्ति का हौसला बुलंद होगा।
- समाज के दलित, वंचित, दमित, शोषित और पिछड़े तबकों में जन्म लेने वाले बच्चों के लिए उम्मीद की किरण अक्सर नजर नहीं आती। वे समाज के कठिनाइयों भरे ढांचे में खुद को असहाय महसूस करते हैं,
- लेकिन इस अंधकार में भी उन्हें प्रेरणा देने वाले महानायक हैं—भगवान बिरसा मुंडा। उनका जीवन संघर्ष और साहस की ऐसी मिसाल है जो इन तबकों के बच्चों के लिए न केवल उम्मीद का प्रकाश बनकर उभरता है बल्कि उनके आत्म-सम्मान और अधिकारों के प्रति जागरूकता की राह भी दिखाता है। बिरसा मुंडा का संघर्ष हर उस बच्चे के लिए एक संदेश है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने अधिकारों के लिए खड़े होकर समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
- त्याग, तपस्या, साहस तेरी पहचान,
तेरी राह चले यह सारा जहान।
धरती आबा, तेरी गाथा महान,
तू आदिवासियों का है भगवान।
- तेरे जन्म के ये डेढ़ सौ साल,
हर दिल से उठे जयघोष, तुझे नमन।
भगवान बिरसा, तुझको वंदन,
तेरी प्रेरणा से चमके भारत का गगन।
- धरती के लाल, वीर बिरसा नाम,
जन-जन में फैला जिनसे पैगाम।
जंगल, जमीन अपने हक की पुकार,
तूने ही उठाई थी आज़ादी की धार।
- अधिकारों की लौ जलाई जो तूने,
हर दिल में उम्मीद जगाई जो तूने।
मिशनरियों के कुचक्रों को मिटाया
दुष्ट फिरंगियों को भी छकाया।
- त्याग, तपस्या, साहस तेरी पहचान,
तेरी राह चले यह सारा जहान।
धरती आबा, तेरी गाथा महान,
तू आदिवासियों का है भगवान।
- तेरे जन्म के ये डेढ़ सौ साल,
हर दिल से उठे जयघोष, तुझे नमन।
भगवान बिरसा, तुझको वंदन,
तेरी प्रेरणा से चमके भारत का गगन।