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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो भारत के मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी में मांधाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है।

मंदिर को भगवान शिव के भक्तों द्वारा अत्यंत पवित्र माना जाता है, और इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना बहुत शुभ माना जाता है।

मध्य प्रदेश को धर्म नगरी भी कहा जाता है। इस प्रदेश में एक से अधिक विश्व प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं।

इनमें महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, ममलेश्वर, पशुपतिनाथ, भोजेश्वर महादेव, चौरागढ़ महादेव, बटेश्वर के शिव मंदिर, ककनमठ मंदिर, ईश्वरा महादेव मंदिर प्रमुख हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के खंडवा में है। यह शहर नर्मदा नदी के किनारे बसा है। वर्तमान समय में ओंकारेश्वर मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन हेतु ओंकारेश्वर मंदिर आते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ओंकारेश्वर मंदिर में देवों के देव महादेव और माता पार्वती चौपड़ खलेने आते हैं। वहीं, चौपड़ खलेने के बाद रात्रि विश्राम भी करते हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को भगवान शिव के सबसे पवित्र और शक्तिशाली ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। ‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द दो शब्दों से बना है – ‘ज्योति’ जिसका अर्थ है प्रकाश और ‘लिंग’ जिसका अर्थ है भगवान शिव का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व।

12 ज्योतिर्लिंगों को स्वयंभू माना जाता है और इन्हें बहुत ही शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इन ज्योतिर्लिंगों की पूजा करने से व्यक्ति के पाप धुल जाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है

ओंकारेश्वर की महिमा का उल्लेख पुराणों में शंकद पुराण, शिव पुराण व वायु पुराण में किया जाता है।ओंकारेश्वर धाम किसी मोक्ष धाम से कम नहीं है ओम के आकार में बने धाम की परिक्रमा कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग विभाजित प्रकृति का है। ज्योतिर्लिंग का आधा हिस्सा ओंकारेश्वर मंदिर में और आधा हिस्सा मम्मलेश्वर मंदिर में है।

तीर्थयात्रियों को पूर्ण ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए इन दोनों मंदिरों में जाना चाहिएबताया जाता है कि हिंदू धर्म के सभी तीर्थ स्थलों का दर्शन करने के बाद ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का दर्शन करते हैं।

यहां सभी तीर्थ स्थल से लाए गए जल को चढ़ाने से विशेष पुण्य मिलता है। ज्योतिर्लिंग का दर्शन करने के बाद भक्त ओंकारेश्वर की परिक्रमा करते हैं।

ओंकारेश्वर में उत्तर से दक्षिण तक कई मंदिर हैं और पूरा परिक्रमा मार्ग मंदिरों से भरा हुआ है। परिक्रमा का समापन नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर विराजमान अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से करते हैं।

ओंकारेश्वर और अमलेश्वर या ममलेश्वर दोनों शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग माना जाता है। चूंकि ओंकारेश्वर मंदिर चारों ओर से नर्मदा नदी से घिरा द्वीप है।

इसलिए आप अगर पैदल चलने में समर्थ ना हो तो नौका परिक्रमा भी कर सकते हैं। नर्मदा नदी के मध्य ओमकार पर्वत पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर हिंदुओं की चरम आस्था का केंद्र है ।

यहां ऊं शब्द की अत्पत्ति श्री ब्रह्मा जी के मुख से हुई है। इसलिए हर धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं शब्द के साथ ही किया जाता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ॐकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इसलिए इसे ओंकारेश्वर नाम से पुकारा जाता है।

ओंकारेश्वर की महीमा का उल्लेख पुराणों में संकद पुराण, शिवपुराण व वायुपुराण में किया जाता है। हिंदुओं में सभी तीर्थों के दर्शन पश्चात ओंकारेश्वर के दर्शन व पूजन का विशेष महत्व है ।

तीर्थ यात्री सभी तीर्थों का जल लाकर ओमकारेश्वर में अर्पित करते हैं, तभी सारे तीर्थ पूर्ण माने जाते हैं। अन्यथा वे अधूरे ही माने जाते हैं

हिंदू धर्म में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिग को लेकर कई मान्यताएं हैं. जिसमें सबसे बड़ी मान्यता ये है कि भगवान भोलेनाथ तीनों लोक का भ्रमण करके प्रतिदिन इसी मंदिर में रात को सोने के लिए आते हैं।

महादेव के इस चमत्कारी और रहस्यमयी ज्योतिर्लिंग को लेकर यह भी मानना है कि इस पावन तीर्थ पर जल चढ़ाए बगैर व्यक्ति की सारी तीर्थ यात्राएं अधूरी मानी जाती है.

हिंदू धर्म में ज्योतिर्लिंग का विशेष महत्व है और ओंकारेश्वर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में चौथा है। मध्यप्रदेश में 12 ज्योतिर्लिंगों में से 2 ज्योतिर्लिंग हैं।

एक उज्जैन में महाकाल के रूप में और दूसरा ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर- ममलेश्वर महादेव के रूप में। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग इंदौर से 77 किलोमीटर पर है।

मान्यता है कि सूर्योदय से पहले नर्मदा नदी में स्नान कर ऊं के आकार में बने इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन और परिक्रमा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यहां भगवान शिव के दर्शन से सभी पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।चूंकि द्वीप का आकार ॐ प्रतीक जैसा बताया जाता है।

इसी कारण इसे ओंकारेश्वर कहा जाता है। ओंकारेश्वर का अर्थ है ओंकार का भगवान या ओम ध्वनि का भगवान। जबकि अमलेश्वर का अर्थ अमर भगवान है अथवा अमर अर्थात देवों के स्वामी।

ओंकार दो शब्दों से बना है, ओम (ध्वनि) और अकार (सृष्टि)। अद्वैत मत का कहना है कि मूल मंत्र ॐ ही सृष्टि का रचयिता है।

ओंकारेश्वर में प्रतिदिन विश्राम करते हैं महादेव

ओंकारेश्वर मंदिर के पुजारी के अनुसार माना जाता है की 12 ज्योतिर्लिंगों में यह एकमात्र ज्योतिरलिंग है जहां महादेव शयन करने आते हैं।

भगवान शिव प्रतिदिन तीनों लोकों में भ्रमण के पश्चात यहां आकर विश्राम करते हैं। भक्तगण एवं तीर्थयात्री विशेष रूप से शयन दर्शन के लिए यहां आते हैं।

भोलेनाथ के साथ यहां माता पार्वती भी रहती हैं और रोज रात में यहां चौसर-पांसे खेलते हैं। यहां शयन आरती भी की जाती है, शयन आरती के बाद ज्योतिर्लिंग के सामने रोज चौसर-पांसे की बिसात सजाई जाती है।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि रात में गर्भगृह में कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन जब सुबह देखते हैं तो वहां पांसे उल्टे मिलते हैं, यह अपने आप में एक बहुत बड़ा रहस्य है जिसके बारे में कोई नहीं जानता।

ओंकारेश्वर मंदिर में भगवान शिव की गुप्त आरती की जाती है जहां पुजारियों के अलावा कोई भी गर्भगृह में नहीं जा सकता। पुजारी भगवान शिव का विशेष पूजन एवं अभिषेक करते हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग परिसर एक पांच मंजिला इमारत है। जिसकी प्रथम मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव और पांचवी मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर है।

ओंकारेश्वर में अनेक मंदिर हैं नर्मदा के दोनों दक्षिणी व उत्तरी तटों पर मंदिर हैं। पूरा परिक्रमा मार्ग मंदिरों और आश्रमों से भरा हुआ है।

कई मंदिरों के साथ यहां अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा जी के दक्षिणी तट पर विराजमान हैं।

ओंकारेश्वर और अमलेश्वर दोनों शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यहां पर्वतराज विंध्य ने घोर तपस्या की थी और उनकी तपस्या के बाद उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना कर कहा के वे विंध्य क्षेत्र में स्थिर निवास करें उसके बाद भगवान शिव ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली।

वहां एक ही ओंकारलिंग दो स्वरूपों में बंटी है। इसी प्रकार से पार्थिवमूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी, उसे ही परमेश्वर अथवा अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग कहते हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर में पूजा और नियम

मंदिर में नियमित रूप से प्रतिदिन 3 पूजा की जाती हैं। तीनों पूजा अलग-अलग पूजारियों द्वारा की जाती है।

प्रातःकालीन पूजा ट्रस्ट द्वारा की जाती है, दोपहर की पूजा सिंधिया घराने के पुजारी करते हैं और सायंकालीन पूजा होलकर स्टेट के पुजारी द्वारा की जाती है।

मंदिर में साल भर ही भक्तों की भीड़ लगी रहती है। लेकिन सावन माह में मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है। कहा जाता है की जो भक्त नर्मदा में स्नान कर नर्मदा जल से भरे पात्र, पुष्प, नारियल एवं अन्य सामग्री लेकर भगवान का पूजन करते हैं वे भगवान की असीम कृपा को प्राप्त करते हैं।कई भक्त पुरोहित के साथ भगवान का विशेष पूजन एवं अभिषेक भी करते हैं।

प्रत्येक सोमवार को भगवान ओंकारेश्वर की तीन मुखों वाली स्वर्णखचित मूर्ति एक सुन्दर पालकी में विराजित कर ढोल नगाडों के साथ पुजारियों एवं भक्तों द्वारा जुलुस निकाला जाता है जिसे डोला या पालकी कहते हैं इस दौरान सर्वप्रथम नदी तट पर जाते हैं एवं पूजन अर्चन किया जाता है तत्पश्चात नगर के विभिन्न भागों में भ्रमण किया जाता है।

यह जुलुस सोमवार सवारी के नाम से जाना जाता है। पवित्र श्रावण मास में में यह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है एवं भारी मात्रा में भक्त नृत्य करते हुए एवं गुलाल उड़ाते हुए ओम् शम्भू भोले नाथ का उद्घोष करते हैं यह बड़ा ही सुन्दर द्रश्य होता है।

ओंकारेश्वर मंदिर का समय

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर 365 दिन खुला रहता है। ओंकारेश्वर दर्शन सुबह 5:00 बजे शुरू होता है और दोपहर 12 बजे तक चलता है। दोपहर 12 बजे मंदिर बंद हो जाता है।

फिर शाम 5 बजे खुलता है और रात 8 बजे बंद हो जाता है। कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता है। तीन आरती होती हैं, और समय इस प्रकार हैं:

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पूजा

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में महा रुद्राभिहेक, लघु रुद्राभिषेकम्, नर्मदा आरती, भगवान भोग और मुंडन। नर्मदा आरती आमतौर पर शाम को नर्मदा नदी के तट पर की जाती है।

महारुद्राभिषेक के दौरान पंडित ओंकारेश्वर महादेव का वेद मंत्रोच्चार करते हैं।

रुद्राभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे अच्छा तरीका है। मंदिर में आने वाले तीर्थयात्रियों का मानना है कि यदि वे रुद्र अभिषेक करते हैं तो भगवान तुरंत उनकी शुद्ध इच्छाएं सुनते हैं।

इसके अलावा लघु रुद्राभिषेक करने से व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

ओंकारेश्वर मंदिर की कुछ सेवाएँ और पूजाएँ हैं:

महारुद्राभिषेक : यह अभिषेक लिंग के सामनेऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद का पाठ करके होता है ।

लघु रुद्राभिषेकम् : भक्तों का मानना ​​है कि इस पूजा को करने से व्यक्ति स्वास्थ्य के साथ-साथ धन संबंधी समस्याओं को भी दूर कर सकता है ।

नर्मदा आरती: हर शाम नर्मदा नदी के तट पर महाआरती होती है जो देखने में अद्भुत होती है।

भगवान भोग: इस दौरान भक्त प्रतिदिन शाम को भगवान शिव को नैवेद्यम भोग चढ़ाते हैं। भोग (भोजन) में शुद्ध घी, चीनी और चावल होते हैं।

मुंडन भक्त मामूली कीमत पर भी मुंडन करा सकते हैं।

ज्योतिर्लिंग का महत्व

एक बार ब्रह्मा (सृष्टि निर्माता) और विष्णु (संरक्षण और देखभाल के देवता) के बीच सृष्टि की सर्वोच्चता को लेकर विवाद हो गया था।

उनका परीक्षण करने के लिए, शिव (संहारक) ने तीनों लोकों को प्रकाश के एक विशाल अंतहीन स्तंभ अर्थात ज्योतिर्लिंग के रूप में भेद दिया।

विष्णु और ब्रह्मा दोनों दिशाओं में प्रकाश के अंत का पता लगाने के लिए क्रमशः नीचे और ऊपर की ओर चले जाते हैं। ब्रह्मा ने झूठ बोला कि उन्हें अंत का पता चल गया, जबकि विष्णु ने अपनी हार मान ली।शिव प्रकाश के दूसरे स्तंभ के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा को श्राप दिया कि उन्हें समारोहों में कोई स्थान नहीं मिलेगा जबकि विष्णु की अनंत काल तक पूजा की जाएगी।

ज्योतिर्लिंग में से शिव आंशिक रूप से प्रकट होते हैं। इस प्रकार ज्योतिर्लिंग तीर्थ वे स्थान हैं जहाँ शिव प्रकाश के एक उग्र स्तंभ अर्थात ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।ज्योतिर्लिंग स्वयंभू हैं अर्थात वे स्वयंभू हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर की कहानी

 ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी तीन कहानियां प्रचलित हैं जिसमें से एक कहानी के अनुसार एक बार नारद जी विंध्यांचल पर्वत पहुंचे। वहां पहुँचते ही पर्वतराज कहे जाने वाले विंध्यांचल ने नारद जी का आदर-सत्कार किया।

इसके बाद विंध्यांचल पर्वतराज ने कहा कि मैं सर्वगुण संपन्न हूँ, मेरे पर सब कुछ है। नारद जी पर्वतराज की बातों को सुनते रहे और चुप खड़े रहे। जब पर्वतराज की बात समाप्त हुई तो नारद जी उनसे बोले कि मुझे ज्ञात है कि तुम सर्वगुण सम्पन्न हो परन्तु फिर भी तुम समेरु पर्वत की भांति ऊँचे नहीं हो।

सुमेरु पर्वत को देखो जिसका भाग देवलोकों तक पहुंचा हुआ है परन्तु तुम वहां तक कभी नहीं पहुँच सकते हो।   नारद जी इन बातों को सुन विंध्यांचल पर्वतराज खुद को ऊँचा साबित करने के लिए सोच-विचार करने लगे। नारद जी की बातें उन्हें बहुत चुभ रही थी और वे बहुत परेशान हो गए क्योंकि यहाँ पर उनके अहंकार की हार हुई।

अपने आप को सबसे ऊँचा बनाने की कामना के चलते उन्होंने भगवान शिव की पूजा करने का मन बनाया। उन्होंने लगभग 6 महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या कर प्रसन्न किया।

अंततः भगवान शिव विंध्यांचल से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रकट होकर वरदान मांगने को कहा। है

इसपर विंध्यांचल पर्वत ने कहा कि हे! प्रभु मुझे बुद्धि प्रदान करें और मैं जिस भी कार्य को आरंभ करू वह सिद्ध हो। इस प्रकार विंध्यांचल पर्वत ने वरदान प्राप्त किया। 

भगवान शिव को देख आस-पास के ऋषि मुनि वहां पर आगये और उन्होंने भगवान शिव से यहाँ वास करने की प्रार्थना की। इस प्रकार भगवान शिव ने सभी की बात मानी, वहां पर स्थापित लिंग दो लिंगम में विभाजित हो गया। 

इसमें से विंध्यांचल द्वारा स्थापित पार्थिव लिंग का नाम ममलेश्वर लिंग पड़ा जबकि जहाँ भगवान शिव का वास माना जाता है उसे ओंकारेश्वर शिवलिंग के नाम से जाना जाने लगा।

ओंकारेश्वर लिंग से जुड़ी दूसरी कहानी कहती है कि  राजा मान्धाता ने यहाँ पर्वत भगवान शिव का ध्यान करते हुए घोर तपस्या की थी। 

उनकी तपस्या से भगवान शिव अत्यधिक प्रसन्न हुए थे और राजा ने उन्हें यहाँ सदैव के लिए निवास करने के लिए कहा था। तभी से यहाँ पर ओंकारेश्वर नामक शिवलिंग स्थापित है जिसकी आज तक अत्यधिक मान्यता है। 

तीसरी कहानी के संबंध में कहा जाता है कि जब देवताओं और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध हुआ और सभी देवता दैत्यों से पराजित हो गए तब उन्होंने अपनी हताशा में भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी।

देवताओं की सच्ची श्रद्धा भक्ति देख भगवान शिव ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप  हुए और उन्होंने सभी दैत्यों को पराजित किया

ओंकारेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग में करने योग्य बातें

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग आगंतुकों को एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है, और ऐसी कई गतिविधियाँ हैं जिनमें कोई भी अपनी तीर्थ यात्रा का अधिकतम लाभ उठा सकता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में करने के लिए कुछ चीजें यहां दी गई हैं:

नर्मदा नदी में पवित्र स्नान करें: नर्मदा नदी को हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे पवित्र नदियों में से एक माना जाता है, और यह ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर के आसपास बहती है।

ऐसा माना जाता है कि पवित्र नदी में अनुष्ठानिक स्नान करने से आत्मा शुद्ध होती है और पाप धुल जाते हैं, जिससे यह भक्तों के लिए एक जरूरी गतिविधि बन जाती है।

शाम की आरती में शामिल हों: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में शाम की आरती (प्रार्थना समारोह) एक मंत्रमुग्ध कर देने वाला अनुभव है।

दीपक, धूप और पवित्र मंत्रों के साथ की जाने वाली भव्य आरती को देखने के लिए भक्त मंदिर परिसर में इकट्ठा होते हैं, जिससे एक दिव्य माहौल बनता है। यह आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी अनुभव है जो हृदय को भक्ति और श्रद्धा से भर देता है।

मंदिर परिसर का अन्वेषण करें: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर वास्तुशिल्प चमत्कारों और पवित्र मंदिरों का खजाना है। परिसर को सुशोभित करने वाले जटिल नक्काशीदार मंदिरों, तीर्थस्थलों और मूर्तियों को देखने के लिए अपना समय लें।

वास्तुकला की नागर और द्रविड़ शैलियों की प्रशंसा करें, और प्रत्येक मंदिर से जुड़े समृद्ध इतिहास और पौराणिक कथाओं के बारे में जानें।

नर्मदा नदी में नाव की सवारी करें: ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा नदी में एक द्वीप पर स्थित है, और शांत नदी में नाव की सवारी करना एक जरूरी गतिविधि है।

मंदिर परिसर, आसपास की पहाड़ियों और नर्मदा नदी के चमकदार पानी के मनोरम दृश्यों का आनंद लें। यह एक शांत अनुभव है जो आपको प्रकृति से जुड़ने और उस स्थान के आध्यात्मिक वातावरण में डूबने की अनुमति देता है।

महाशिवरात्री उत्सव में भाग लें: यदि आप महाशिवरात्री के उत्सव के दौरान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जाते हैं, तो उत्सव में भाग लेने का अवसर न चूकें।

महाशिवरात्रि के दौरान भव्य उत्सव, सांस्कृतिक कार्यक्रम और भक्ति उत्साह इसे एक अनोखा और यादगार अनुभव बनाते हैं।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग तक कैसे पहुंचे?

हवाई मार्ग  – ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में देवी अहिल्या बाई होलकर हवाई अड्डा है, जो लगभग 77 किलोमीटर दूर है। हवाई अड्डे से, ओंकारेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए टैक्सी किराए पर ली जा सकती है या बस ली जा सकती है।

ट्रेन द्वारा  – मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन है, जो मध्य प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। रेलवे स्टेशन से, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए टैक्सी किराए पर ली जा सकती है या बस ली जा सकती है।

सड़क मार्ग- अगर आप सड़क मार्ग से खंडवा के ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग  जा रहे हैं तो आपको खंडवा आना होगा। मंदिर सड़क नेटवर्क से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है, और मध्य प्रदेश के नजदीकी कस्बों और शहरों से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। ओंकारेश्वर बाबा ज्योतिर्लिंग तक पहुंचने के लिए कोई टैक्सी किराए पर ले सकता है या अपना वाहन चला सकता है। 

ओंकारेश्वर मंदिर का इतिहास

मध्यकाल में ओंकारेश्वर मंदिर की देख भाल आदिवासी भीलों के सरदार परमारों द्वारा की जाती थी। जब ओरंगजेब ने भारत में आक्रमण किया तो उसने भारतीय मंदिरों और हिन्दू देवी देवताओं को तहस-नहस करना शुरू कर दिया।

ओरंगजेब ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर ओंकारेश्वर मंदिर को बहुत नुकसान पहुंचाया था। बाद में ग्वालियर के महाराज सिंधिया ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया। जब अंग्रेजों के आने के बाद उन्होने इस मंदिर को अपने अधीन कर लिया था।

लेकिन आजादी के बाद यह मंदिर पुनः अपनी मुख्य धारा में लौट आया।ओंकारेश्वर मंदिर का निर्माण प्राचीन नागर शैली में किया गया है। यह सफ़ेद मुलायम पत्थर से बना एक शानदार मंदिर है। इस मंदिर की बनावट ही इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। इस मंदिर की सुंदरता इसके ऊपर बनी मीनार है।

इस मीनार के निर्माण में 5 अलग-अलग प्रकार की परतें बनाई गई हैं, जो विभिन्न हिंदू देवताओं की छवि पेश करती हैं। मंदिर के दोनों तटों पर नर्मदा और कावेरी नदी बहती है।

प्राचीन काल में लोग मंदिर में पहुँचने के लिए नावों और बोटों का इस्तेमाल करते थे।इस मंदिर में 68 तीर्थ है जिसमें 33 करोड़ देवी देवता परिवार सहित रहते हैं 2 ज्योतिर्लिंग सहित 108 शिवलिंग भी हैं।

यहां भगवान शिव साक्षात प्रकट हुए हैं इसलिए इन्हें ज्योतिर्लिंग कहा जाता है।।ओम्कारेश्वर मंदिर के भीतर अनेक मंदिर हैं। नर्मदा के दोनों दक्षिण और उत्तरी तट पर मंदिर है अगर कोई भक्त ओंकारेश्वर क्षेत्र की तीर्थ यात्रा करता है तो उसे केवल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन ही नहीं बल्कि वहां बसे अन्य 24 अवतारों के भी दर्शन करना चाहिए।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भारत के मध्य प्रदेश के मध्य में स्थित एक प्रतिष्ठित मंदिर है। यह देश के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है , और यह हिंदू इतिहास और आध्यात्मिकता में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर मांधाता नामक द्वीप पर स्थित है, जो नर्मदा नदी से घिरा हुआ है, जिससे इसका दृश्य मनमोहक हो जाता हैओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर न केवल तीर्थयात्रियों के लिए एक आध्यात्मिक गंतव्य है, बल्कि एक सांस्कृतिक केंद्र भी है जो दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करता है।

मंदिरकी वास्तुकला, जटिल नक्काशी और शानदार आभा इसे प्राचीन भारतीय कला और शिल्प कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनाती है।

शिव पुराण के अनुसार ज्योतिर्लिंगों की एक अलग कहानी है । एक बार, भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु में सर्वोच्चता को लेकर बहस हो गई।

वे भगवान शिव के पास गये। शिव ने कहा कि जो अपने शरीर के छोर को खोज लेता है वह सर्वोच्च है।इतना कहकर उन्होंने अनन्त ज्योति का रूप धारण कर लिया।

भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली। भगवान ब्रह्मा ने अपना अंत ढूंढ़ने के लिए झूठ बोला। अत: शिव ने ब्रह्मा को श्राप दिया।

इसी कारण से पृथ्वी पर भगवान ब्रह्मा का कोई मंदिर नहीं है। ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के अनंत स्वरूप को जोड़ने वाले स्थान हैं। 64 ज्योतिर्लिंग थे। आज की दुनिया में केवल 12 ही मनुष्य को ज्ञात हैं

भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंत्र

कावेरिका नर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जन तारणया |
सदायव मांधात्रिपुरे वसंतमोन्करमिशं शिवमेकामिदे ||

वह भगवान हैं, जो अच्छे लोगों के रक्षक हैं और महान भगवान हैं, जो हमेशा कावेरी और नर्मदा नदी के पवित्र संगम पर रहते हैं, कोई और नहीं भगवान ओंकारेश्वर हैं, एक ज्योतिर्लिंग हैं।

 

ओंकारेश्वर मंदिर का महत्व

सभी ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से, ओंकारेश्वर का नर्मदा नदी के कारण अधिक महत्व है। अगर आप गौर करें तो यहां ओंकारेश्वर को छोड़कर कहीं भी नदी टूटकर तुरंत नहीं मिलती है।

नदियों में शुद्ध करने की शक्ति होती है।भगवान को प्रणाम करने के लिए माँ नर्मदा फूट पड़ीं। इस प्रकार, ओंकारेश्वर की पूजा करने से हमारा मन और आत्मा शुद्ध हो जाती है।

नदी द्वीपों पर स्थित मंदिर इसी कारण अत्यंत शक्तिशाली होते हैं। वे हमारी आत्मा को कुछ ही क्षणों में शुद्ध कर देते हैं।

ओम द्वीप

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर शिवपुरी द्वीप पर है। यह द्वीप “ओम” के आकार का है। प्रतीक ओम सर्वोच्च चेतना का सार है और परमात्मा का ध्वनि प्रतिनिधित्व है।

ओम का जाप करके आप आसानी से सर्वोच्च परमात्मा, ब्रह्म से जुड़ सकते हैं। ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन के समय नर्मदा नदी के किनारे बैठकर कुछ देर ”ओम” का जाप करें। आप निश्चित रूप से ऊर्जावान महसूस करेंगे।

नर्मदाजी का महत्त्व

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ नर्मदाजी का भी विशेष महत्व है। यहाँ घाट के पास नर्मदाजी को कोटितीर्थ या चक्रतीर्थ माना जाता है।

यहीं नर्मदा नदी में स्नान करके सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर ऑकारेश्वर के मन्दिर में दर्शन करने जाते हैं। शास्त्र मान्यता के अनुसार जमुनाजी में पंद्रह दिन स्नान और गंगाजी में सात दिन का स्नान करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है उतना ही पुण्यफल नर्मदाजी में एक बार स्नान करने से प्राप्त हो जाता है

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से लाभ

लिंग स्वयंभू है, जिसका अर्थ है स्वयंभू। मानुषी लिंग मानव निर्मित हैं। भगवान स्वयंभू रूप में प्रकट होते हैं। स्वयंभू शिव लिंग अत्यंत शक्तिशाली होते हैं।

प्रत्येक ज्योतिर्लिंग का एक विशिष्ट लाभ होता है। ओंकारेश्वर महादेव शांति, आराम और समृद्धि प्रदान करते हैं

आदि गुरु शंकराचार्य की अपने गुरु से भेंट

आदि शंकराचार्य अपने गुरु गोविंदा भगवत्पाद से ओंकारेश्वर मंदिर में मिले थे। आप शिव मंदिर के ठीक नीचे श्री आदि शंकराचार्य की एक छवि पा सकते हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर में मनाए जाने वाले त्यौहार

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के मंदिर में साल भर अनेक त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा, नवरात्रि और मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी समेत कई धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन शामिल होते हैं।इसके अलावा, महार संक्रांति, कार्तिक पूर्णिमा और नर्मदा जयंती भी बहुत भव्यता के साथ मनाई जाती है।

कार्तिक पूर्णिमा दस दिनों तक मनाई जाती है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने ज्योति स्वरूप धारण किया था।

और इस दिन भगवान की पूजा करने वाले व्यक्तियों को मोक्ष की प्राप्ति होगी।माघ माह में नर्मदा उत्सव मनाया जाता है। त्योहार के दौरान, पूरे द्वीप को दीयों से रोशन किया जाता है।

आतिशबाजी का प्रदर्शन भी होता है। यह त्यौहार नर्मदा जयंती पर मनाया जाता है, जो शुक्ल पक्ष सप्तमी को आता है।ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भारतीय धार्मिक ऐतिहासिकता और धार्मिक संस्कृति का महत्वपूर्ण संकेत है।

इसे यहां के स्थानीय लोगों के द्वारा श्रद्धा से पूजा जाता है और यह एक सच्चे और अनुभवी धार्मिक स्थल के रूप में यात्रियों को आकर्षित करता है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्रति लोगों की विशेष भक्ति है। इसे भक्तियोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है और यहां पर आने वाले भक्त शिव की आराधना के लिए दिल से प्रयास करते हैं। यहां पर साधारणतया भक्तों को शांति और मनोवृत्ति मिलती है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की मान्यता

ओंकारेश्वर तीर्थ नर्मदा क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ माना गया है शास्त्रें की मान्यता है कि कोई भी तीर्थयात्री चाहे कितने ही तीर्थ भ्रमण कर ले किंतु जब तक वह ओंकारेश्वर में सभी तीर्थों का जल लाकर यहां नहीं चढ़ाता उसके सारे तीर्थ अधूरे ही होते है ओंकारेश्वर तीर्थ के साथ नर्मदा जी का भी विशेष महत्व है।

शास्त्रें की मान्यता है कि जमुना जी में 15 दिन स्नान तथा 7 दिन स्नान करके जो फल प्रदान करता है इतना पुण्य फल सिर्फ नर्मदा जी के दर्शन मात्र से प्राप्त होता है।

 

ओंकारेश्वर के पास स्थित रेलवे स्टेशन

ओंकारेश्वर मंदिर के निकटतम रेलवे स्टेशन का नाम ओंकारेश्वर रेलवे स्टेशन है जो मंदिर से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

यह प्रमुख रतलाम-खंडवा रेलवे लाइन पर स्थित है और नई दिल्ली, बैंगलोर, मैसूर, लखनऊ, चेन्नई, कन्याकुमारी, पुरी, अहमदाबाद, जयपुर को रतलाम जैसे शहरों से जोड़ता है।

ओंकारेश्वर मंदिर सड़क मार्ग में खंडवा से 73 किलोमीटर, इंदौर से 86 किलोमीटर, उज्जैन से 133 किलोमीटर दूर है। यहाँ पर मध्य प्रदेश परिवहन निगम बसों, निजी बसों और टैक्सी के माध्यम से पहुंचा जा सकता है।

ओंकारेश्वर में घूमने की जगह

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में 24 अवतार, सीता वाटिका, माता घाट, मार्कंडेय शीला, मार्कंडेय संयास आश्रम, ओंकार मठ, माता वैष्णो देवी मंदिर, अन्नपूर्णा आश्रम, बड़े हनुमान, सिद्धनाथ गौरी सोमनाथ, धावड़ी कुंड, विज्ञान साला, ब्रह्मेश्वर मंदिर, विष्णु मंदिर, वीरखला, चांद-सूरज दरवाजे, गायत्री माता मंदिर, ऋण मुक्तेश्वर महादेव, आड़े हनुमान, से गांव के गजानन महाराज का मंदिर, काशी विश्वनाथ, कुबेरेश्वर महादेव, के मंदिर भी दर्शनीय है।

केदारेश्वर मंदिर

केदारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का धार्मिक महत्व दुनिया भर से भक्तों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था।

सिद्धनाथ मंदिर

इस मंदिर का निर्माण ओंकारेश्वर मंदिर के पास ही किया गया है। इस मंदिर का निर्माण 13 वीं शताब्दी में किया गया था। यह मंदिर अपनी प्राचीन वास्तुकला के कारण बहुत प्रसिद्ध है।

ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन करने बाद भक्तगण इस मंदिर में भी दर्शन के लिए जाते है।

श्री गोविंद भागवतपाड़ा गुफा

यह गुफा हमारे हिन्दू धर्म में बहुत अधिक पवित्र मानी जाती है। इस गुफा में एक मुख्य हॉल और एक शिवलिंग के साथ एक छोटा गर्भगृह है।

ऐसा माना जाता है कि यहीं पर शंकराचार्य महान संत गोविंदा भागवतपाद से मिले थे और उन्होंने उनके अधीनआध्यात्मिक शिक्षा और दीक्षा ग्रहण की थी

ममलेश्वर मंदिर

ममलेश्वर मंदिर नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित है। इसका सही नाम अमरेश्वर है। भक्तगण ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर दोनों जगह दर्शन पूजन करते हैं।

यह मंदिर प्राचीन वास्तु कला एवं शिल्पकला का अद्वितीय नमूना है। मंदिर की दीवारों पर विभिन्न महिन स्त्रोत उकेरे गए हैं जो की 1063 इस्वी के बताये जाते हैं।

महारानी अहिल्या बाई होलकर इस मंदिर में पूजन अर्चन किया करती थीं एवं तभी से आज तक होलकर स्टेट के पुजारी यहाँ पूजन करते हैं।

मंदिर का प्रबंधन ‘अहिल्याबाई खासगी ट्रस्ट’ द्वारा किया जाता है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा घोषित संरक्षित स्मारक है।

पंचमुखी गणेश मंदिर

सभी देवों में भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने जाते हैं। ओंकारेश्वर में मुख्य मंदिर के पहले पंचमुखी गणेश मंदिर स्थित है। यहाँ गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है।

यह उसी पाषाण में उत्पन्न हुई है जिसमे श्री ओंकारेश्वर प्रकट हुए है। मूर्ति में 2 मुख दायें 2 मुख बाएं एवं 1 सामने की ओर है। भक्त श्री ओंकारेश्वर से पहले यहाँ दर्शन करते हैं। भादों मास की चतुर्थी को यहाँ यज्ञ का आयोजन किया जाता है।

वृहदेश्वर मंदिर

यह मंदिर ममलेश्वर मंदिर के समीप स्थित है। मंदिर में अत्यंत ही सुन्दर शिल्पकारी एवं नक्काशी की गयी है एवं यह मंदिर अत्यंत ही दर्शनीय है। वर्तमान में यहाँ 24 अवतारों की मूर्तियां स्थापित है।

गोविंदेश्वर मंदिर एवं गुफा

यह मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर के प्रवेशद्वार के पास ही स्थित है। यह एक सर्वमान्य तथ्य है की जगद्गुरु शंकराचार्य ने दीक्षा एवं योग लेख शिक्षा अपने गुरु गोविन्द भाग्वदपाद द्वारा ओंकारेश्वर में ही ग्रहण की थी।

वह स्थान जहाँ जगद्गुरु शंकराचार्य ने दीक्षा ग्रहण की थी श्री गोविन्देश्वर मंदिर कहलाता है। एवं जहाँ गुरु गोविन्द भाग्वदपाद निवास करते थे तथा तप किया करते थे वह स्थान गोविन्देश्वर गुफा कहलाता है।

इस मंदिर का जीर्णोद्धार सन 1989 ई. में जगद्गुरु जयेन्द्र सरस्वती द्वारा करवाया गया था एवं निर्माण कार्य का शिलान्यास तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आर वेंकटरमण ने किया था।

अन्नपूर्णा मंदिर

यह एक प्राचीन मंदिर है जिसमे एक विशाल परिसर निर्मित किया गया है। इस परिसर में सर्वमंगला मंदिर भी स्थित है जिसमे देवी लक्ष्मी, सरस्वती एवं पार्वती की मूर्ति स्थापित है।

यहाँ एक 35 फुट ऊँची भगवान कृष्ण की विराट स्वरूप मूर्ति स्थापित है। भगवान कृष्ण के विराट स्वरुप का वर्णन श्रीमद भगवतगीता में किया गया है।

महाकालेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर में मंदिर के नीचे से दूसरे तल पर श्री महाकालेश्वर मंदिर भी स्थित है जैसा की उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर ज्योतिर्लिंग में श्री ओंकारेश्वर मंदिर भी स्थित है।

यहाँ श्री महाकाल ऊपर एवं श्री ओमकार नीचे हैं एवं इसके उलट उज्जैन में श्री ओमकार ऊपर एवं महाकाल नीचे हैं। यहाँ श्री महाकालेश्वर मंदिर में भक्तगण श्रद्धाभाव से पूजन अर्चन करते हैं एवं इनका दर्शन भी सम्पूर्ण ओंकारेश्वर दर्शन में आवश्यक माना जाता है।

गुरुद्वारा ओंकारेश्वर साहिब

श्री गुरुनानक देव जी महाराज अपनी देशव्यापी धार्मिक यात्रा के दौरान ओंकारेश्वर आये थे। इसी घटना की स्मृति में सिक्ख समाज द्वारा यहाँ पर एक गुरुद्वारा निर्मित किया गया है।

हिंदू एवं सिक्ख समाज के धर्मावलंबी यहाँ श्रद्धाभाव से दर्शन करते हैं।

सैलानी आईलैंड

ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग के पास ओंकारेश्वर बांध के बैकवाटर में सैलानी आयलैंड विकसित किया गया है। तीन एकड़ क्षेत्र में 15 करोड़ रुपए खर्च कर यह पयर्टन केंद्र विकसित किया गया है।

ओंकारेश्वर बांध परियोजना में वर्ष भर 198 मीटर बैकवाटर रहता है। यहाँ सागौन की लकड़ी से 22 कॉटेज एवं एक सर्व-सुविधायुक्त सुइट उपलब्ध है।

हर कॉटेज के पास मिनी गार्डन भी बना है। सैलानियों के लिए रेस्टोरेंट में लजीज पकवान 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं।यह टापू जंगल के बीचोंबीच स्थित है इसलिए यहां की प्राकृतिक लोकेशन बहुत अच्छी है।

आसपास वन होने से मौसम में ठंडक है तो वहीं बैकवाटर में वाटर स्पोट्र्स का आनंद भी लिया जा सकता है। यहां वाटर स्पोट्र्स के लिए बोट क्लब है।

सैलानी टापू इंदौर से करीब 80 किमी की दूरी पर है। बड़वाह से 17 किमी दूर जैन तीर्थस्थली सिद्धवरकूट से 3 किमी एवं ओंकारेश्वर से 7 किमी दूर है।

ओंकारेश्वर के पास पर्यटन स्थल

 हनुवंतिया रिसॉर्ट

हनुवंतिया टापू मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया जल पर्यटन स्थल हैं। यह इन्दिरा सागर बांध के निर्माण के बाद उत्पन्न हुई विशाल झील पर बनाया गया हैं।

बैक वाटर में बना यह टापू देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर का पहला टापू है जहाँ आवास, भोजन, नौका विहार, क्रूज़ राइड की सुविधा है। यहाँ ठहरने के लिए 10 कॉटेज बनाए गए हैं। इसके अलावा एक क्रूज और दो मोटर-बोट हैं। टापू पर बोट-क्लब और रेस्टोरेंट भी बनाया गया है।

टापू को हरा-भरा बनाने के लिए बगीचा भी लगाया गया है। हनुवंतिया टापू 60 हजार वर्ग फीट में से ज्यादा में फैला हुआ हैं। यहाँ प्रतिवर्ष भव्य जल महोत्सव का आयोजन किया जाता है जिसमे आपको साइकिलिंग, पतंगबाजी, विंड सफरिंग, जेटस्की, बनाना राइड, नाईटकैम्पिंग, बर्ड वाचिंग, ट्रेकिंग जैसी गतिविधियाँ करने का मौका मिल जायेगा।

हनुवंतिया के सबसे निकट खंडवा रेलवे स्टेशन हैं जिससे इसकी दूरी 50 किलोमीटर हैं। सबसे निकटतम एअरपोर्ट देवी अहिल्याबाई होलकर एअरपोर्ट इंदौर हैं जिससे इसकी दूरी 150 किलोमीटर हैं। हनुवंतिया का मौसम सैलानियों के दृष्टी से वर्ष भर अनुकूल रहता हैं।

सिद्धवर कूट जैन तीर्थ

नर्मदा नदी के दक्षिणी तट पर प्रसिद्ध जैन तीर्थ सिद्धवर कूट स्थित है। यह नर्मदा एवं कावेरी के संगम पर स्थित है। यह जैन धर्मं के महत्व पूर्ण स्थलों में से एक है एवं विभिन्न पौराणिक पात्रों की मोक्ष्स्थली माना जाता है।

यहाँ 10 जिनालय स्थित हैं जिनमे से कुछ 1488 ई. के बने हुए हैं। फाल्गुन मास की 13 वी से 15 वी तिथि तक यहाँ वार्षिक समारोह होता है। ओंकारेश्वर से बस मार्ग से अथवा नाव द्वारा जाया जा सकता है एवं ठहरने के लिये धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।

महेश्वर

महेश्वर शहर मध्य प्रदेश के खरगोन में स्थित है। नर्मदा नदी के किनारे बसा यह शहर अपने बहुत ही सुंदर व भव्य घाट तथा माहेश्वरी साड़ियों के लिये प्रसिद्ध है।

घाट पर अत्यंत कलात्मक मंदिर हैं जैसे की कालेश्वर, राजराजेश्वर, विठ्ठलेश्वर और अहिलेश्वर जिनमे से राजराजेश्वर मंदिर प्रमुख है। आदिगुरु शंकराचार्य तथा पंडित मण्डन मिश्र का प्रसिद्ध शास्त्रार्थ यहीं हुआ था।इस शहर को महिष्मती नाम से भी जाना जाता था।

महेश्वर का रामायण और महाभारत में भी उल्लेख है। देवी अहिल्याबाई होलकर के कालखंड में बनाए गए यहाँ के घाट सुंदर हैं और इनका प्रतिबिंब नदी में और खूबसूरत दिखाई देता है।यहाँ राजगद्दी और रजवाड़ा भी स्थित है महेश्वर ओंकारेश्वर से 70 किलोमीटर की दूरी पर है यहाँ सड़क मार्ग से जाया जाता है।

बुरहानपुर

यह नगर मध्‍यप्रदेश में ताप्‍ती नदी के कि‍नारे स्थित है। यह ओंकारेश्वर से लगभग 120 किमी की दुरी पर स्थित है। कई विशाल द्वारों से सुसज्जित परकोटों से यह नगर घिरा हुआ है। बुरहानपुर मुगलों के काल में कुछ समय तक राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित था।

ओंकारेश्वर झूला पुल

ओंकारेश्वर आने वालों दर्शनार्थियों के लिए झूला पुल एक विशेष आकर्षण है। भक्तों कि बढती हुई संख्या को देखते हुए नर्मदा हाइड्रो इलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कार्पोरेशन द्वारा वर्ष 2004 में ममलेश्वर सेतु नामक एक नए पुल का निर्माण किया गया|

यह पुल है 235 मीटर लंबा एवं 4 मीटर चौड़ा है। यह पुल सीधे मुख्य मंदिर के द्वार तक पहुँचता है एवं पूरे वर्ष उपयोग में लाया जाता है।

ओंकारेश्वर आने वाले सैलानियों के लिए यह भी एक विशिष्ठ सुविधा है कि यहाँ से नर्मदा नदी ओंकारेश्वर बांध एवं मंदिर का मनोरम द्रश्य दिखलाई पड़ता है।

पुल के ओंकार पर्वत वाले सिरे से मंदिर तक पहुँचने के लिए स्काई वाक बनाया गया है एवं परिक्रमा पथ पर जाने का मार्ग भी यहीं स्थित है। पुल पर धूप बारिश से बचाव के लिए शेड  का निर्माण किया गया है

ओंकारेश्वर बांध परियोजना

ओंकारेश्वर बांध परियोजना का विचार सर्वप्रथम 1965 ई. में आया था। इसका उद्देश्य मध्य भारत में बिजली एवं सिंचाई की व्यवस्था करना है।

ये नर्मदा घटी में बनाये गए 30 बांधों में से एक है। इस बांध का क्षेत्र नर्मदा एवं कावेरी (नर्मदा की उपनदी) के तटीय इलाके में है।

यह एक 949 मीटर लंबा तथा 33 मीटर ऊँचा कॉन्क्रीट का बना बांध है जिसकी 520 मेगावाट की विद्युत उत्पादन क्षमता है।यह देश में 2004 ई. से 2006ई. में सबसे तेजी से पूरी की जाने वाली जल विद्युत परियोजना है|

बांध ने २००७ से कार्य करना शुरू किया. इस बांध के द्वारा कई वर्ग किलोमीटर का एक जलाशय निर्मित हुआ है जिसमे सुन्दर टापू बन गए हैं. जिन पर विभिन्न पर्यटन परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं।

ओंकारेश्वर मंदिर के बारे में पूछे जाने वाले प्रश्न

1.क्या ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग पूरे वर्ष खुला रहता है?

जी हां, ओंकारेश्वर मंदिर साल के सभी 365 दिन खुला रहता है।

2.ओंकारेश्वर मंदिर का प्रवेश शुल्क क्या है?

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में प्रवेश निःशुल्क है

3.ऑनलाइन दर्शन सुविधा उपलब्ध है?

नहीं । ऑनलाइन दर्शन की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है.

4.क्या ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई सुविधा है?

नहीं । विशेष रूप से विकलांग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई सुविधा नहीं है।

5.ओंकारेश्वर मंदिर कहाँ है?

भगवान शिव को समर्पित ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश राज्य के खंडवा नामक जिले में नर्मदा नदी के निकट शिवपुरी और मान्धाता द्वीप पर अवस्थित है।

यह मंदिर इसलिए भी अधिक ख़ास हैहै क्योंकि यहाँ भगवान शिव 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर स्थापित है। कहा जाता है कि इस स्थान पर नर्मदा नदी स्वयं ‘ॐ’ के आकार में बहती हैं।

साथ ही बताते चलें कि जब तक सभी तीर्थों का जल तीर्थ यात्री ओंकारेश्वर मंदिर में अर्पित नहीं करते हैं तब तक तीर्थ यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है। 

6.ओंकारेश्वर मंदिर  में कौन कौन सी नदी का संगम है।

प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों में से एक ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश में नर्मदा और कावेरी नदी के संगम पर स्थित है। बता दें कि ओंकारेश्वर में दो ज्योतिर्लिंग स्थापित है एक तो ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग और एक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

ओंकारेश्वर मान्धाता पर्वत और शिवपुरी के मध्य में स्थित है जबकि दक्षिणी तट पर ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग अवस्थित है। 

 निष्कर्ष

ओंकारेश्वर मंदिर भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। इसका इतिहास, किंवदंतियां, स्थापत्य सौंदर्य और धार्मिक महत्व इसे लाखों लोगों के लिए गहरी भक्ति और श्रद्धा का स्थान माना जाता है।

यह मंदिर भगवान शिव के दिव्य स्वरूप के प्रतीक के रूप में कार्य करता है और आध्यात्मिक साधकों और भक्तों के लिए एक शांत और पवित्र स्थान प्रदान करता है।

ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन न केवल एक धार्मिक यात्रा है बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभव भी है। यह लोगों को अपने आध्यात्मिक पूर्वजों से जुड़ने और हिंदू धर्म के प्राचीन सिद्धांतों और ज्ञान में डूबने की जानकारी देता है।

भक्ति, ज्ञान और सांस्कृतिक सहभागिता-प्रस्ताव के केंद्र के रूप में, ओंकारेश्वर मंदिर भारत में एक कलातीत और प्रतिष्ठित संस्थान बना है।