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कबीरदास का जीवन परिचय | kabir das jivan parichay |Kabir das biography in hindi

कबीरदास का जीवन परिचय | kabir das ka jivan parichay |Kabir das biography in hindi

हिन्दी साहित्य का इतिहास बहुत पुराना है, हिन्दी साहित्य का द्वितीय चरण भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है।

भक्ति काल को सवर्णयुग के नाम से जाना जाता है। इस युग में दो धाराएं चली निर्गुणधारा और सगुणधारा। निर्गुणधारा में संत काव्य धारा व सुफी काव्य धारा शामिल थी।

सगुणधारा में रामकाव्यधारा व कृष्णकाव्यधारा शामिल थी।  संत काव्यधारा के प्रमुख समाज सुधारक कवि कबीर दास हैं।

15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे।

संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे हैं।

समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग-युग के गुरु थे। उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर साहित्य क्षेत्र में नव निर्माण किया था।

कबीरदास जी एक महान कवि और समाज सुधारक थे। इन्होनें अपने साहित्य से लोगों को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

इसके साथ ही समाज में फैली कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया है। कबीरदास जी सादा जीवन जीने में यकीन रखते थे वे अहिंसा, सत्य, सदाचार गुणों के प्रशंसक थे।

कबीरदास जैसे कवियों का भारत में जन्म लेना गौरव की बात है। कबीर दास जी ने अपने काव्य के जरिए समाज में फैली कुरीतियों को दूर किया है।

इसके साथ ही सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण का विरोध किया है।

महान विद्वान कवि कबीरदास जी ने अपने जीवन में किसी तरह की शिक्षा नहीं ली थी। लेकिन उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों, कल्पना शक्ति और अध्यात्म कल्पना शक्ति के बल पर पूरी दुनिया को वो ज्ञान दिया।

जिसे अमल कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता हासिल कर सकता है।कबीर कहते हैं कि परिश्रम में सफलता का आनन्द छिपा है। जो मनुष्य परिश्रम करता है उसका ईश्वर भी साथ देता है।

उन्होंने अपने विचारों से लोगों को प्रेम की परिभाषा सिखाई एवं उनके मन में सकारात्मक भाव पैदा किए।

वे हिन्दी साहित्य के महिमामंडित व्यक्तित्व थे जिन्होंने न सिर्फ अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया बल्कि समाज में फैली तमाम कुरीतियों को दूर करने के अथक प्रयास किए।

संत कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे | kabir ke dohe in hindi

कबीर ने विधिवत शिक्षा नहीं पाई थी परंतु सत्संग पर्यटन तथा अनुभव से उन्हें ज्ञान प्राप्त किया है

भक्ति कालीन निर्गुण परंपरा के प्रमुख कवि कबीर की रचनाएं मुख्यत: कबीर ग्रंथावली संग्रहित हैं किंतु कबीर पंथ में उनकी रचनाओं का संग्रह बीजक ही प्रामाणिक माना जाता है कुछ रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित है

कबीर अत्यंत उदार निर्भय और गृहस्थ संत थे राम और रहीम की एकता में विश्वास रखने वाले कबीर ने ईश्वर के नाम पर चलने वाले हर तरह के पाखंड भेदभाव और कर्मकांड का खंडन किया उन्होंने अपने काव्य में धार्मिक और सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की कल्पना की ईश्वर प्रेम ज्ञान तथा वैराग्य गुरु भक्ति सत्संग और साधु महिमा के साथ आत्मा बोध और जगत बोध की अभिव्यक्ति उनके काव्य में हुई है कबीर की भाषा की सहजता ही उनकी काव्यात्मकता की शक्ति है जन भाषा के निकट होने के कारण उनकी काव्य भाषा में दार्शनिक चिंतन को सरल ढंग से व्यक्त करने की ताकत है

कबीर ने गुरु का स्थान भगवान से बढ़कर बताया है।

कबीरदास ने एक जगह पर गुरु को कुम्हार का उदाहरण देते हुए समझाया है कि – जो मिटटी के बर्तन के समान अपने शिष्य को ठोक-पीटकर सुघड़ पात्र में बदल देता है।

कबीर दास हमेशा सत्य बोलने वाले निडर और निर्भाक व्यक्ति थे। वे कटु सत्य भी कहने से नहीं बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते थे।

कबीर दास की ये भी एक खासियत थी कि वे निंदा करने वाले लोगों को अपना हितैषी मानते थे। कबीरदास को सज्जनों, साधु-संतो की संगति अच्छी लगती थी। कबीर दास जी का कहना था कि –

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।

वे अपने उपदेशों से समाज में बदलाव करना चाहते थे और समस्त मानव जीवन को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देते थे।

कबीरदास जी ने आदर्श समाज की स्थापना पर बल दिया। कबीरदास जी जैसे महान कवियों के जन्म लेने से भारत भूमि धन्य हो गई।

हिन्दी साहित्य में उनके अतुलनीय योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है।

कबीर दास जी ने अपने लेखन से समाज में फैली कुरोतियों को दूर किया है इसके साथ ही सामाजिक भेदभाव और आर्थिक शोषण के खिलाफ विरोध किया है।

कबीर का काव्य उच्च कोटि का धार्मिक नैतिक साहित्य है तो वही समाज सुधारक का वाहक भी। उनकी वाणी जीवन के अनुभवों पर आधारित है।

उनका उद्देश्य समाज कल्याण और न्याय पूर्ण व्यवस्था स्थापित करना था। इसी उद्देश्य से उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया और धर्मांधता के गढ़ को ध्वस्त किया।

समता और अहिंसा को अपने शिक्षा का आधार बनाया।

कबीरदास कहते हैं कि जीवन में विनम्रता सबसे बड़ा गुण है। यह सब गुणों की खान है। सारे जहां की दौलत होने के बाद भी सम्मान विनम्रता से ही मिलता है।

कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहा जाता है। क्योंकि वाणी अर्थात् दोहों के द्वारा कवि ने समाज को एक नई दिशा दिखाई है।

व्यक्तिगत स्वार्थ तथा संसारित मोह माया से मुक्त वे अपने मन के बादशाह थे। कबीरदास मानवीय दोषों के परित्याग पर बल देते थे। वे कहते थे कि उन लोगों से दोस्ती मत रखना जो पर छिन्द्रान्वेषी हो।

उन इंसानों के पास जाना महापाप जो कपटी हो।

कबीरदास अपने समाज को संसोधित रूप में देखना चाहते थे। उन्होने हिन्दुओं तथा मुस्लिमों में मध्य भेदभाव को मिटाकर धार्मिक सद्भाव और साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित करने का भरसक प्रयास किया।

वे पूजा जपतप माला, छापा, तिलक, केश , मुण्डन , व्रत उपवास तीर्थ यात्रा आदि को निरर्थक समझते थे।

उन्होने मनुष्य को पथ – भ्रष्ट करने वाले समस्त कुविचारों और बाह्य विचारों की स्पष्ट शब्दों में कठोर आलोचना एवं तीव्र भत्र्सना की। कबीर महान समाज सुधारक थे उन्होने सत्य प्रेम का भण्डन तथा अज्ञान तथा घृणा का खण्डन किया है।

“कबीरदास ऐसे ही मिलन बिन्दु पर खडे थे ,जहां एक और हिन्दुत्व निकल जाता था और दूसरी और अशिवा , जहां एक और हिन्दुत्व निकल जाता था दूसरी और मुस्लमान , जहां एक और ज्ञान भक्ति मार्ग निकल जाता है , दूसरी और योग मार्ग , जहां एक और निर्गुण भावना निकल जाती है , दूसरी और सगुण साधना।

उसी प्रशस्त चैराहे पर वे खड़े थे। वे दोनो को देख सकते थे और परस्पर विरूद्ध दिशा में गए और मार्गों के गुण दोष उन्हे स्पष्ट दिखाई दे जाते थे। ”

कबीर कहते हैं कि बड़ी बड़ी किताबें पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बनता। कितने ही लोग हैं जो किताबें पढ़ पढ़ कर संसार से मृत्यु के मुहं तक चले गए।

कबीर कहते हैं कि यदि कोई प्यार के ढ़ाई अक्षर ही अच्छी तरह से पढ़ ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।

कबीदास संत ,कवि और समाजसुधारक थे ,वे पूरे संसार में सुधार लाना चाहते थे , कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में समाज में फैली कुरीतियों का खण्डन किया।

कबीर अमीर-गरीब , जाति पाति भेदभाव धन धान्य से परिपूर्ण जीवन में विश्वास नहीं करते थे।वे सादा जीवन व्यतीत करते थे।

धर्म के नाम पर चल रहे भेद भाव तथा उनके बीच बनती खाई को पाटने की पूरी कोशिश की है।

कबीर एक महान क्रान्तिकारी थे। जिन्होने बड़े निडर भाव से अपने विचारो को व्यक्त किया है।

कबीर ने समाज में एक नई धारा अर्थात प्रेम की धारा प्रवाह किया। समाज में व्याप्त अन्धविश्वास ,पाखण्ड , मूर्ति पूजा का उन्होने खण्डन किया है। धर्म के नाम पर हिंसा व पशुबलि का विरोध किया है।

कबीर ने मनुष्य के ज्ञान व कर्म को ही महान् बताया है। वे अपने युग के महान दार्शनिक थे।उनके लिखे दोहे आधुनिक युग में भी प्रासांगिक है। उनके दोहों में अनुभूति की सच्चाई एवं अभिव्यक्ति का खरापन है।

वे सभी इंसान को एक ही ईश्वर की सन्तान मानते हैं। हिन्दू – मुस्लिम की बढ़ती खाई को पाटने का काम संत कवि कबीरदास ने ही किया था।

उन्होने धर्म के नाम पर होने वाले दंगों का पूरजोर खण्डन किया है। उन्होने भगवान का निवास स्थान अपने मन में ही बताया है।

“ कस्तूरी कुण्डली बसै, मृग ढूढें बन मांहि।
एसै घटि घटि राम है , दुनियां देखे मांहि।। ”

कबीर कहते हैं कि हिरण कस्तूरी की खुशबू को जंगल में ढूंढता फिरता है। जबकि कस्तूरी की वह सुगन्ध उसकी अपनी नाभि में व्याप्त है। परन्तु वह जान नहीं पाता।

उसी प्रकार भगवान कण कण में व्याप्त है परन्तु मनुष्य उसे तीर्थों मे ढूढ़ता फिरता है।

कबीर दास का जन्म

कबीर दास का जन्म 1398 ई० में हुआ था। कबीर दास के जन्म के संबंध में अनेक प्रकार की बातें लोगों द्वारा कही जाती हैं कुछ लोगों का कहना है कि वह जगत गुरु रामानंद स्वामी जी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे!

ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आई। उसे वहां से एक नीरू नाम का जुलाहा अपने घर लेकर आया और उसी ने उनका पालन पोषण किया।

बाद में इस बालक को कबीर कहा जाने लगा। कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से हिन्दू नहीं थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म की बातें मालूम हुई।

कुछ कबीरपंथीयों का यह मानना है कि कबीर दास का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ था।

कबीर के शब्दों में—

 “काशी में परगट भये, रामानंद चेताये “

कबीर दास का जन्म स्थान

कबीर दास के जन्म स्थान के संबंध में यह कहा जाता है कि मगहर, काशी में उनका जन्म हुआ था।

कबीर दास ने अपनी रचना में भी वहां का उल्लेख किया है: “पहिले दरसन मगहर पायो पुनि काशी बसे आई” अर्थात काशी में रहने से पहले उन्होंने मगहर देखा था और मगहर आजकल वाराणसी के निकट ही है और वहां कबीर का मकबरा भी है।

कबीरदास जी की शिक्षा

कबीर दास जी बचपन में किताबी विद्या ग्रहण नहीं कर सके। दिन भर भोजन की व्यवस्था करने के लिए कबीर को दर-दर भटकना पड़ता था| पढ़े लिखे न होते हुऐ भी कबीर का ज्ञान बहुत ही विस्तृत था।

साधु संतों और फकीरों की संगति में बैठकर कबीर जी ने वेदांत और उपनिषदों व योग का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर लिया था। सूफी फकीरों की संगति में बैठकर उन्होंने मुस्लिम इस्लाम धर्म के सिद्धांतों की भी संपूर्ण जानकारी ले ली थी|

मसि कागद छुवो नहीं, कमल गही नहिं हाथ
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

आपको बता दें कि कबीरदास जी ने खुद ग्रंथ नहीं लिखे वे उपदेशों को दोहों को मुंह से बोलते थे जिसके बाद उनके शिष्यों उसे लिख लिया करते थे।

संत कबीर ने अपनी दिव्य वाणी से लोगों के जीवन से अंधकार को दूर करने के लिए बहुत सी बातों का जिक्र किया है।

कबीरदास जी का विवाह और बच्चे

संत कबीरदास जी का विवाह वनखेड़ी बैरागी की कन्या ”लोई” के साथ हुआ था।

विवाह के बाद दोनों को संतान का सुख मिला कबीरदास जी के बेटे का नाम कमाल था जबकि बेटी का नाम कमाली था।

वहीं इन लोगों को परिवरिश करने के लिए कबीरदास जी को अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था।

जिससे घर साधु-संतों का आना-जाना लगा रहता था। वहीं उनके ग्रंथ साहब के एक श्लोक से अनुमान लगााया जाता है उनका पुत्र कमाल कबीर दास जी के मत का विरोधी था।

“बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल। हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल।”

जबकि कबीर जी की पुत्री कमाली का वर्णन कबीर जी ने कहीं पर भी नहीं किया है।

कबीर जी के घर में संत-मुनियों के लगातार आने-जाने उनके बच्चों को खाना मिलना तक मुश्किल हो गया था। इस वजह से कबीर की पत्नी गुस्सा भी करती थी जिसके बाद कबीर अपनी पत्नी को ऐसे समझाते हैं –

“सुनि अंघली लोई बंपीर। इन मुड़ियन भजि सरन कबीर।।”

आपको बता दें कि कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पंथ के अनुसार कामात्य उनका शिष्य था और कमाली और लोई उनकी शिष्या थी।

लोई शब्द का इस्तेमाल कबीर जी ने एक जगह कंबल के रुप में भी किया है। वहीं एक जगह लोई को पुकार कर कबीर ने कहा कि –

“कहत कबीर सुनहु रे लोई। हरि बिन राखन हार न कोई।।”

वहीं यह भी माना जाता है कि लोई कबीर जी की पहले पत्नी होगी इसके बाद कबीर जी ने इन्हें शिष्या बना लिया हो। कबीर जी ने अपने दोहे में कहा है कि –

“नारी तो हम भी करी, पाया नहीं विचार। जब जानी तब परिहरि, नारी महा विकार।।

आध्यात्मिक गुरु

कबीरदास की हार्दिक इच्छा थी, कि उनके गुरु संत आचार्य रामानंद जी बने लेकिन आचार्य रामानंद जी ने कबीर दास को अपना गुरु बनाने से इनकार कर दिया।

किंतु कबीर दास जी ने भी ठान लिया था, कि वे अपना गुरु आचार्य रामानंद जी को ही बनाएंगे इसलिए उन्होंने एक लीला रची।

कबीर साहेब जी को गुरु बनाने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह अपने आप में स्वयंभू यानि पूर्ण परमात्मा है। परंतु उन्होंने गुरु मर्यादा व परंपरा (गुरु शिष्य के नाते) को निभाए रखने के लिए कलयुग में स्वामी रमानंद जी को अपना गुरु बनाया।

कबीर साहेब जी ने ढाई वर्ष के बालक के रूप में पंच गंगा घाट पर लीलामाय रूप में रोने कि लीला कि थी, स्वामी रमानंद जी वहाँ प्रतिदिन सन्नान करने आया करते थे, उस दिन रमानंद जी की खड़ाऊँ कबीर परमात्मा जी के ढाई वर्ष के लीलामय शरीर में लगी, उनके मुख से तत्काल ‘राम-राम’ शब्द निकला। कबीर जी ने रोने कि लीला की, तब रमानंद जी ने झुककर उनको गोदी में उठाना चाहा, उस दौरान उनकी (रमानंद जी की) कंठी कबीर जी के गले में आ गिरी।

तब से ही रमानंद जी कबीर साहेब जी के गुरु कहलाए।

कबीर के ही शब्दों में:

काशी में परगट भये , रामानंद चेताये ||

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।

अर्थ: संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु और गोविंद जब एक साथ खड़े हों तो उन दोनों में से आपको सबसे पहले किसे प्रणाम करना चाहिए। कबीरदास जी के अनुसार सबसे पहले हमें अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही गोविंद यानि भगवान के पास जाने का मार्ग बताया है।

कबीर दास की भाषा शैली

कबीर की रचनाओं में अनेक भाषाओँ के शब्द मिलते हैं यथा – अरबी, फारसी, भोजपुरी, पंजाबी, बुन्देलखंडी, ब्रज, खड़ीबोली आदि के शब्द मिलते हैं इसलिए इनकी भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ या ‘सधुक्कड़ी’ भाषा कहा जाता है

करीब दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था।

इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारो और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे।

कबीर दास ने अपनी रचनाओं में बोलचाल की भाषा का ही प्रयोग किया है भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था।

वो अपनी जिस बात को जिस रूप में प्रकट करना चाहते थे उसे उसी रूप में प्रकट करने की क्षमता उनके पास थी।

भाषा भी मानो कबीर सामने कुछ लाचार सी थी उसमें ऐसी हिम्मत नहीं थी कि उनकी इस फरमाइश को ना कह सके।

वाणी के ऐसे बादशाह को साहित्य—रसिक कव्यांद का आस्वादन कराने वाला समझे तो उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता।

कबीर ने जिन तत्वों को अपनी रचना से ध्वनित करना चाहा है, उसके लिए कबीर की भाषा से ज्यादा साफ और जोरदार भाषा की संभावना भी नहीं है और इससे ज्यादा जरूरत भी नहीं है। कबीर दास जी को भाषा का डिटेक्टर कहां गया है

कबीरदास जी की रचनाएँ (kabir das ki rachnaye)

रचनाएं:- कबीर दास जी की रचनाएं कृतियां और उनकी वाणी का संग्रह बीजक के नाम से प्रसिद्ध है इनकी प्रमुख तीन रचनाएं देखने को मिलती है बीजक के अंतर्गत आप देख सकते है।

बीजक (साखी सबद रमैनी) यह कई भाषाओं जैसे ब्रज, अवधि, पूरबी, खड़ी बोली, राजस्थानी और पंजाबी सभी भाषाओं का संग्रह थी।

साखी:- कबीर की साखी शब्द को संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका शब्दि अर्थ “साक्षी ” होता है। इसका अधिकतर उपयोग धर्म के उपदेश देने के लिए किया गया है।

कबीर की साखी अधिकतर दोहा छंद में लिखी गयी है परन्तु कहीं – कहीं इसमें सोरठा का भी उपयोग किया गया है। कबीर की शिक्षा का प्रचार अधिकांशत: साखी में ही किया गया है ।

सबद- इसमें कबीर दास जी के मुख्य उद्देश्य, भाव बताएं गए। यह पूरी तरह संगीतात्मक रूप में लिखी गई इसमें कबीर के प्रेम साधना की अभिव्यक्ति मिलती है।

सबद को गेय पद कहा जाता है ,क्योकि इसे गाकर बताया जाता है ,इसमें संगीत विध्यमान होता होता है। इसे एक लय में गाया जाता है।

इसमें उपदेश के स्थान पर भावना की प्रधानता होती है। क्योंकि इसमें कबीर ने अपना प्रेम प्रगट किया है।

रमैनी:- ये चौपाइयां व छंद में लिखी गई है इसके अंतर्गत कबीर के रहस्यवादी व दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया। है। इसमें कबीर ने अपने रहष्यमयी एवं दार्शनिक विचारो को अभिव्यक्त किया है। रमैनी को बीजक की प्रस्तावना भी कहते है। इसमें कबीर दास जी ने हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख आदि धर्मो को सामान रूप से धार्मिक शिक्षा है। रमैनी में 84 पद बताये गए है।

इसके अलावा उनके द्दारा रचित अन्य प्रमुख रचनाओं में भक्ति के अंग, कबीर की वाणी, राम सार , उग्र गीता, अलिफ नाफा, कथनी, ज्ञान गुदड़ी, ज्ञान सागर, करम, चाणंक, राम सार, रेखता, कबीरज अष्टक, बलख की फैज, रेखता आदि प्रमुख हैं।

कबीर दास जी के दोहा–

साईं इतना दीजिये ,जामैं कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ ,साधु न भूखा जाय।।

अर्थ :- कबीर दास जी भगवान से केवल इतना ही धन की माँग कर रहे ,जितने से वे उनका परिवार का पालन – पौषण कर सके। और यदि उनके घर कोई साधु -संत या व्यक्ति आ जाए तो वो उनके घर से भूखा न लौटे।

क्योंकि यदि व्यक्ति के पास अधिक धन हो जाता है ,तो धन के मद में चूर होकर वह अपने विनाश की और बढ़ने लगता है।

कबीरदास जी का निर्गुणी जीवन

कबीर दास जी निर्गुण भक्ति के कवि थे यह मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते हैं उनके अनुसार प्रभु को आप कहीं भी देख सकते हैं वे प्रत्येक कण में विद्यमान है।

जब राम को आप अपने माता-पिता सभी में देख पा रहे हैं तो आप मूर्ति पूजा क्यों करते हो।

कबीर दास जी को कदापि मंजूर नहीं था कि राम किसी फ्रेम ढांचे में बैठ जाएं वो राम की रूपाकृति की भी कल्पना नहीं करते हैं।

उनके अनुसार बस विश्वास होना चाहिए कि राम है, ईश्वर को कभी भी उनके रूप से, काल से उनके नाम से तथा उनके गुण से सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता।

स्वामी रामानंद जी से ज्ञान चर्चा

एक दिन स्वामी रामानंद जी के शिष्य विवेकानंद जी कहीं प्रवचन दे रहे थे। कबीर साहेब जी भी वहाँ चले गए और उनके प्रवचनों को सुनने लगे। ऋषि विवेकानन्द जी विष्णु पुराण से कथा सुना रहे थे। कह रहे थे, विष्णु भगवान सर्वेश्वर हैं,अविनाशी हैं। इनके कोई जन्मदाता माता-पिता नहीं है। 5 वर्षीय बालक कबीर देव जी भी उनका सत्संग सुन रहे थे। ऋषि विवेकानन्द जी ने अपने प्रवचनों को विराम दिया तथा उपस्थित श्रोताओं से कहा यदि किसी को कोई शंका है या कोई प्रश्न करना है तो वह निःसंकोच अपनी शंका का समाधान करा सकता है। कबीर परमेश्वर खड़े हुए तथा ऋषि विवेकानन्द जी से करबद्ध होकर प्रार्थना कि हे ऋषि जी! आपने भगवान विष्णु जी के विषय में बताया कि ये अजन्मा हैं, अविनाशी है। इनके कोई माता-पिता नहीं हैं। एक दिन एक ब्राह्मण श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता अध्याय 6 एवं 7 को पढ़ कर श्रोताओं को सुना रहे थे, दास भी उस सत्संग में उपस्थित था। उसमें वह महापुरुष बता रहे थे कि विष्णु और ब्रह्मा की उत्पत्ति शिव भगवान से हुई है। जिसका प्रमाण देवी भागवत पुराण अध्याय 5 सकन्द 3 पेज संख्या 123 पर में लिखा है।

कबीर परमेश्वर जी के मुख से उपरोक्त उल्लेख सुनकर ऋषि विवेकानन्द अति क्रोधित हो गये तथा उपस्थित श्रोताओं से बोले यह बालक झूठ बोल रहा है। पुराणों में ऐसा कहीं नहीं लिखा है। उपस्थित श्रोताओं ने भी सहमति व्यक्त की कि हे ऋषि जी आप सत्य कह रहे हो यह बालक क्या जाने पुराणों के गूढ़ रहस्य को? आप इस बच्चे की बातों पर ध्यान न दो। ऋषि विवेकानन्द जी ने पुराणों को उसी समय देखा जिसमें सर्व विवरण विद्यमान था। परन्तु मान हानि के भय से अपने झूठे व्यक्तव्य पर ही दृढ़ रहते हुए कहा हे बालक तेरा क्या नाम है? तू किस जाति का है? तूने तिलक लगाया है। क्या तूने कोई गुरु धारण किया है? शीघ्र बताइए।

कबीर परमेश्वर जी के बोलने से पहले ही श्रोता बोले हे ऋषि जी! इसका नाम कबीर है, यह नीरू जुलाहे का पुत्र है। कबीर जी बोले ऋषि जी मेरा यही परिचय है जो श्रोताओं ने आपको बताया। मैंने गुरु धारण कर रखा है। ऋषि विवेकानन्द जी ने पूछा क्या नाम है तेरे गुरुदेव का? परमेश्वर कबीर जी ने कहा मेरे पूज्य गुरुदेव वही हैं जो आपके गुरुदेव हैं। उनका नाम है स्वामी रामानन्द जी। जुलाहे के बालक कबीर परमेश्वर जी के मुख कमल से स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी बताने से ऋषि विवेकानन्द जी ने ज्ञान चर्चा का विषय बदल दिया और परमेश्वर कबीर जी को बहुत बुरा-भला कहा तथा श्रोताओं को भड़काने व वास्तविक विषय भूलाने के उद्देश्य से कहा देखो रे भाईयो! यह कितना झूठा बालक है।

यह मेरे पूज्य गुरुदेव श्री 1008 स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु जी कह रहा है। मेरे गुरु जी तो इन अछूतों के दर्शन भी नहीं करते। शुद्रों का अंग भी नहीं छूते। अभी जाता हूँ गुरु जी को बताता हूँ। भाई श्रोताओ! आप सर्व कल स्वामी जी के आश्रम पर आना सुबह-सुबह। इस झूठे की कितनी पिटाई स्वामी रामानन्द जी करेगें? इसने हमारे गुरुदेव का नाम मिट्टी में मिलाया है। ऋषि जी ने जाकर श्री रामानंद जी से कहा, “गुरुदेव, एक नीची जाति का लड़का है। उसने हमें बदनाम किया है। वह कहता हैं कि स्वामी रामानंद जी मेरे गुरुदेव हैं। “हे भगवान! हमारे लिए बाहर जाना मुश्किल हो गया है।” स्वामी रामानन्द जी ने कहा, “कल सुबह उन्हें बुलाओ। देखो, मैं कल तुम्हारे सामने उसे कितना दण्ड दूँगा।”

अगले दिन सुबह भगवान कबीर जी को स्वामी रामानन्द जी के सामने लाया गया। स्वामी रामानन्द जी ने अपनी झोंपड़ी के सामने यह दिखाने के लिए एक परदा लटका दिया कि उन्हें दीक्षा देने की तो बात ही छोड़िए, मैं उनका चेहरा तक नहीं देखता। स्वामी रामानन्द जी ने बड़े क्रोध में परदे के पार से कबीर परमेश्वर जी से पूछा कि आप कौन हैं? भगवान कबीर जी ने कहा, “हे स्वामी जी, मैं इस सृष्टि का निर्माता हूं। यह सारा संसार मुझ पर आश्रित है। मैं ऊपर सनातन धाम यानि सतलोक में निवास करता हूँ।” स्वामी रामानन्द जी यह सुनकर नाराज़ हो गए। उन्होंने उन्हें फटकार लगाई और उनसे कुछ और प्रश्न पूछे! जिनका उत्तर एक आदर्श शिष्य की तरह व्यवहार करते हुए परमेश्वर कबीर जी ने शांति और विनम्रता से दिया। तब रामानन्द जी ने सोचा कि बालक के साथ चर्चा करने में काफी समय लगेगा, पहले अपनी दैनिक धार्मिक साधना पूरी कर लूँ. स्वामी रामानन्द जी मानसिक पूजा किया करते थे, वे ध्यान की अवस्था में बैठे हुए कल्पना करते थे कि वे स्वयं गंगा से जल लाए हैं, भगवान विष्णु की मूर्ति को स्नान कराया है, वस्त्र बदले हैं, माला पहनाई है और अंत में मूर्ति के मस्तक पर मुकुट यथावत रखा है। उस दिन स्वामी रामानंद जी मूर्ति के गले में माला डालना भूल गए। उन्होंने माला को मुकुट से उतारने की कोशिश की लेकिन माला अटक गई। स्वामी रामानन्द जी हैरान हो उठे, और अपने आप से कहने लगे कि “अपने पूरे जीवन में मैंने आज तक कभी ऐसी गलती नहीं की । पता नहीं मेरे कौनसे जन्म का पाप आगे आ गया आज ?” तभी कबीर परमेश्वर जी ने कहा, “स्वामी जी! माला की गाँठ खोलो। आपको मुकुट उतारना नहीं पड़ेगा।”,

रामानन्द जी ने सोचा, “मैं तो केवल कल्पना कर रहा था। यहां कोई मूर्ति भी नहीं है। बीच में एक पर्दा भी है। और, यह बच्चा जानता कि मैं मानसिक रूप से क्या कर रहा हूं।” वह क्या गाँठ खोलते। यहां तक ​​कि उन्होंने पर्दा भी फेंक दिया और जुलाहा जाति के बालक रूप में कबीर परमात्मा को गले से लगा लिया। रामानन्द समझ गए कि यह परमेश्वर हैं। फिर 5 वर्ष के बच्चे के रूप में भगवान कबीर जी ने 104 वर्ष के महात्मा स्वामी रामानंद जी को ज्ञान समझाया। उन्होंने उन्हें सतलोक दिखाया, तथा उनको वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान बताया और रामानंद जी को नाम दीक्षा दी। कबीर परमेश्वर जी ने रामानन्द जी को सांसारिक दृष्टि से अपना गुरु बना रहने को कहा ताकि आने वाली पीढ़ी यह ना कहे कि कबीर साहेब जी ने कौनसा गुरु बनाया था?। स्वामी रामानन्द जी ने उनसे अनुरोध किया कि वह ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि वे जानते थे कि ईश्वर का गुरु बनना पाप है। भगवान कबीर जी ने कहा, “आप मेरी आज्ञा समझकर इसका पालन करें।” तब स्वामी रामानन्द जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया और वे कबीर साहेब जी के गुरु कहलाये।

कबीर दास का धर्म

कबीर दास के अनुसार, जीवन जीने का तरीका ही असली धर्म है जिसे लोग जीते है ना कि वे जो लोग खुद बनाते है।

उनके अनुसार कर्म ही पूजा है और जिम्मेदारी ही धर्म है। वे कहते थे कि अपना जीवन जीयो, जिम्मेदारी निभाओ और अपने जीवन को शाश्वत बनाने के लिये कड़ी मेहनत करो। कभी भी जीवन में सन्यासियों की तरह अपनी जिम्मेदारियों से दूर मत जाओ।

उन्होंने पारिवारिक जीवन को सराहा है और महत्व दिया है जो कि जीवन का असली अर्थ है। वेदों में यह भी उल्लिखित है कि घर छोड़ कर जीवन को जीना असली धर्म नहीं है।

गृहस्थ के रुप में जीना भी एक महान और वास्तविक सन्यास है। जैसे, निर्गुण साधु जो एक पारिवारिक जीवन जीते है, अपनी रोजी-रोटी के लिये कड़ी मेहनत करते है और साथ ही भगवान का भजन भी करते है।

कबीर ने लोगों को विशुद्ध तथ्य दिया कि इंसानियत का क्या धर्म है जो कि किसी को अपनाना चाहिये। उनके इस तरह के उपदेशों ने लोगों को उनके जीवन के रहस्य को समझने में मदद किया।

कबीर साहेब जी की प्रमुख शिक्षाऐं

  1. अहिंसा
  2. माँसाहार करना माहापाप
  3. अनुशासन निषेध
  4. गुरु बनना अति आवश्यक है
  5. बिना गुरु के दान करना निषेध
  6. व्यभिचार निषेध
  7. छूआछात निषेध

कबीर कहते हैं कि दुर्बल अर्थात गरीब को दुख मत देना क्योंकि यदि उनकी बद्दुआ लगी तो वो सबको नष्ट कर देंगे

कबीरदास रचनाओं की काव्य विशेषताएँ

निर्गुण ब्रह्मा की पूजा

कबीरदास जी ने अपनी कविता में राम शब्द का बार-बार प्रयोग किया है, लेकिन उनका अर्थ था निर्गुण ब्रह्म के साथ राम। वह अपने राम के रूप के बारे में कहता है।

“ना दशरथ घर उतारी आवा। ना लावा का राव सातवा।”

गुरु के महत्व का प्रतिपादन

 कबीर दास जी ने अपनी कविता में निर्गुण ब्रह्म की पूजा के बाद गुरु के महत्व पर जोर दिया है।

उनके अनुसार, केवल सच्चे गुरु ही भगवान को समेटने में सक्षम हैं। उन्होंने गुरु की को भगवान से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया है।

“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, कैकई लागू पाय।”

“बलिहारी गुरु आपनौ, जिन गोविंद दियो मिलय”

धार्मिक पाखंड का विरोध

 कबीर दास ने धर्म के नाम पर पाखंडपूर्ण पाखंड ओ दुष्ट प्रथाओं आदि का कड़ा विरोध किया है।

हिंदू और मुस्लिम धर्म के अनुयायियों की विदेशी प्रथाओं और पाखंड को छोड़ने के लिए उन्होंने कठोर और विडंबनापूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया है।

प्रेम पर जोर

कबीर दास जी ने भी अपने कामों में प्रेम के महत्व को दिखाया है। उनकी नजर में, प्रेम के बिना सारा ज्ञान निरर्थक है।

लेकिन वह नकारात्मक प्रेम के पक्ष में नहीं है, बल्कि सच्चे प्रेम के पक्ष में है। सच्चा प्यार बनाए रखना कोई आसान काम नहीं है।

इसलिए वे कहते हैं कि जहां सच्चा प्यार होता है, वहां अहंकार या गर्व की कोई जगह नहीं होती है।

भक्ति-भाव

यद्यपि निर्गुण कबीर दास जी के स्थान पर ब्रह्मा को महत्व देते हैं, वे भक्ति भावना पर भी जोर देते हैं।

वे सच्चे मन से भगवान को याद करने के लिए सबसे बड़ी भक्ति मानते हैं।

जब तक जप, तपस्या, माला, शरीर पर भस्म, उपवास, तीर्थ यात्रा आदि को भक्ति का साधन नहीं माना जाता है।

जाति-जाति का विरोध

कबीरदास जी ने अपनी कविता में जाति-वर्ग, जाति-व्यवस्था आदि का कड़ा विरोध किया है।

वास्तव में, वह एक मानवतावादी दृष्टिकोण से एक समाज की स्थापना करना चाहता था, जिसमें न तो उच्च और निम्न का कोई भेदभाव है और न ही ब्राह्मण और शूद्र का।

उन्होंने कई स्थानों पर जाति के खिलाफ भेदभाव करने वाले हिंदू और गैर हिन्दुओ को कड़ी फटकार लगाई है।

वासना और प्रेम के विषय का विरोध

 माया कबीर दास ने अपनी कविता में मनुष्य को आध्यात्मिक अभ्यास में लीन रहने और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में वासना का संदेश दिया है, वह प्रेम को सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।

इसलिए, उन्होंने मनुष्य को कई शब्दों का त्याग करने के लिए प्रेरित किया है।

महिलाओं के प्रति संकीर्ण विचारधारा- कबीर दास जी ने महिलाओं के प्रति संकीर्ण मानसिकता और रवैया अपनाया है। यद्यपि उसने एक या दो स्थानों पर पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा की है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर उसने स्त्री को हारा हुआ घोषित किया है।

कहीं इसे कामिनी कहा गया है, तो कहीं यह विष का रूप है। इसका कारण यह है कि वह एक संत कवि थे और सही संतों ने महिलाओं को भक्ति के मार्ग में एक बाधा के रूप में देखा है।

संत कवियों ने नारी को माया का प्रतीक स्वीकार किया है। उनके अनुसार नारी प्रभु मिलन में सबसे बड़ी बाधा है। कबीर का मानना है कि जिस तरह माया के आकर्षण में फंसकर मानव ईश्वर को भूल जाता है वही स्थिति स्त्री-मोह की होती है-

रहस्यवाद

कबीर दास जी ने भी अपनी कविता में ब्रह्मा, जीव आदि के प्रति अपनी गहरी जिज्ञासा व्यक्त की है।

ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करने के लिए, उन्होंने उसे प्रिय के रूप में चित्रित किया है और प्राणी की आत्मा को उसका प्रिय बताया है।

इस आत्मा के रूप में प्यारी अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए दिन-रात परेशान रहती है।

कबीर दास जी की मृत्यु

कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन काशी में ही गुजारा लेकिन वह मरने के समय मगहर चले गए थे।

ऐसा माना जाता है कि मगहर में मरने से नरक मिलता है और काशी में प्राण त्यागने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

वहीं कबीर को जब अपने आखिरी समय का अंदेशा हो गया था तब वे लोगों की इस धारणा को तोड़ने के मगहर चले गए।

ये भी कहा जाता है कि कबीर के शत्रुओं ने उनको मगहर जाने के लिए मजबूर किया था।

वे चाहते थे कि कबीर की मुक्ति न हो पाए, लेकिन कबीर तो काशी मरन से नहीं, राम की भक्ति से मुक्ति पाना चाहते थे।

“जौ काशी तन तजै कबीरा तो रामै कौन निहोटा।”

ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर भी विवाद उत्पन्न हो गया था हिंदू कहते हैं कि उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से।

इसी विवाद के चलते जब उनके शव से चादर हट गई तब लोगों ने वहां फूलों का ढेर पड़ा देखा और बाद में वहां से आधे फुल हिंदुओं ने उठाया और आधे फूल गैर हिन्दुओ ने।

गैर हिन्दुओ ने अपने रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीती से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। मगहर में कबीर की समाधि है उनके जन्म की तरह ही उनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को भी लेकर मतभेद है।

किंतु अधिकतर विद्वान उनकी मृत्यु संवत् 1575 विक्रमी (सन 1518 ई०) को मानते हैं, लेकिन बाद में कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु को 1448 को मानते हैं।

कबीर से सम्बंधित ज्ञानवर्धक कहानियाँ

कबीर दास के जीवन से सम्बंधित बहुत से तथ्य ऐसे है जो बहुत कम लोगो को पता है। उन्ही में से हम कुछ तथ्यों और जीवन शैली को आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है।

कबीर की अपने मन पर विजय

एक बार जब कबीर दास जी बाजार के बीच से गुजर रहे थे तब उन्हें जलेबी की दुकान दिखाई दी ,तो उनका जलेबी खाने का मन हो गया।

कबीर जी कुछ देर तक तो उस दुकान के सामने खड़े रहे फिर उन्होंने जलेबी की दुकान से जलेबी खरीदी और आगे चल दिए । एक वृक्ष के निचे जाकर बैठ गए ।

उन्होंने उन जलेबी को नहीं खाया और अपने मन से कहने लगे की है मन यह तो तेरा काम है जलेबी खाना। तेरी ही इच्छा थी जलेबी खाने की इसलिए मेने तेरे लिए जलेबी खरीदी है ।

कबीर का मन बार – बार जलेबी खाने को करता लेकिन कबीर जी अपने मन से बार – बार अपने मन से यही कहते की यदि तुम जलेबी खाना ही चाहते हो, तो मेरे शरीर से बहार निकला कर खा सको तो खा लो ।

ऐसा बार – बार करने से कबीर जी की जलेबी खाने की इच्छा समाप्त हो गयी और उन्होंने उन जलेबियो को नहीं खाया । जलेबिया उनके सामने ऐसी ही पड़ी रही और कबीर जी मन से लड़ाई करने लग गए ।

कुछ देर बाद एक कुत्ता आया और उन सारी जलेबियों को खाकर चला गया । कबीर जी को मन को समझाने की धुन में पता ही नहीं चला।

इस प्रकार बार – बार मान को मारने के कारण कबीर जी ने अपने मन पर काबू पा लिया और मन से जीत गए ।

कबीर की एक सांस की कीमत

कबीर दास जी निरंतर भगवान का मन ही मन सुमिरन किया करते थे । हर क्षण केवल भगवान कर नाम ही उनकी सांसो में चला करता था । और ध्यान भी ईश्वर में ही लगा रहता था

कबीर दास के माता पिता जुलाहा थे , अतः वे भी कपड़े बुनने ओर कपड़े सिलने का कार्य किया करते थे ।

एक दिन कबीर जी कपड़ा सी रहे थे तो सुई से धागा निकल गया । कबीर जी सुई में फिर से धागा पिरोने लग गए लेकिन धागा नही पिरोया गया ।

धागा पिरोते – पिरोते कबीर जी का ध्यान एक पल के लिये भगवान के नाम सुमिरन से हट ओर सुई धागे में लग गया ।

कबीर दास ने अगले ही क्षण ध्यान को फिर से सुमिरन में केंद्रित कर दिया।

जोर- जोर से बिलख -बिलख कर रोने लग गये । जब सब ने कबीर दास को रोते हुए देखा तो सब पूछने लग गए की तुम क्यों रो रहे हो ?

कबीर ने जवाब दिया के मेरा एक साँस बेकार चली गयी । मेरा ध्यान एक पल के लिए प्रभु से अलग हो गया था। अगर उस समय मेरी मृत्यु हो जाती तो में ईश्वर को क्या मुँह दिखता।

मेरा तो जीवन नष्ट हो जाता मेरी मुक्ति तो टल ही जाती इसलिए मुझे बहुत दुःख हो रहा है ,की मेने एक सुई धागे के कारण अपना ध्यान प्रभु से हटा लिया । एक साँस भी कितनी कीमती है मैने उसे ऐसे ही जाने दिया।

इस प्रकार कबीर ने साँसो के महत्व को समझाया। और कहा इसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता है । इसी के सहारे तो प्रभु का नाम शरीर में चल रहा है।

इस पर कबीर ने एक साखी कही :

निरंजन माला ,घट में फिर है दिन – रात,

ऊपर आवे निचे जावे, साँस – साँस चढ़ जात ।

संसारी नर समझे नाहीं,बिरथा उमर गवात,

निरंजन माला घट में फिर है दिन – रात

कबीर दास जी के भजन

अपने जीवन काल में कुछ प्रसिद्ध भजन गाये हैं।

“कबीरा जब हम पैदा हुये जग हँसे हम रोये।

ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।

चदरिया झिनी रे झिनी

राम नाम रस भीनी

चदरिया झिनी रे झिनी

चादर ओढ शंका मत करियो,

ये दो दिन तुमको दिन्ही।

मुरख लोक भेद नही जाने,

दिन दिन मैली किन्ही।।

चदरिया झिनी रे झिनी..

ध्रुव प्रल्हाद सुदामा ने ओढी चदरिया,

शुकदे मे निर्मल किन्ही।

दास कबीर ने ऐसी ओढी,

ज्यु की त्यु धर दिन्ही।।

के राम नाम रस भीनी,

चदरिया झिनी रे झिनी”

कबीर दास जी किस काल के कवि थे (Kabir das kis kaal ke kavi the)

वासवी भक्ति काल के कवि थे

कबीर दास जी की भाषा कौन सी है

कबीर की भाषा सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी है।

कबीर दास जी का जन्म कब हुआ था? (Kabir das ka janm kab hua tha)

 कबीर दास 1398 का जन्म में हुआ था

कबीर दास जी का जन्म कहां हुआ था? (Kabir das ka janm kahan hua)

कबीर दास का लहरतारा ताल, काशी के समक्ष हुआ था

कबीरदास किस धारा के कवि थे? (Kabir das kis dhara ke kavi the)

15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे

कबीर दास जी के गुरु कौन थे? (Kabir das ke guru kaun the)

कबीर दास जी के गुरु संत रामानंद थे

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